मप्र में जुल्म की इन्तिहा या कोरी राजनीति

राकेश अचल

मध्य प्रदेश की हाई-प्रोफाइल बुधनी विधानसभा इलाके के कोसमी गांव में गरीब परिवारों के मकानों पर बुलडोजर चलाए जाने के मामले ने बड़ा राजनीतिक तूल पकड़ लिया है. घटना की जानकारी मिलते ही पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान रविवार को खुद मौके पर पहुंचे. वहां उजाड़े गए गरीब परिवारों की आपबीती सुनकर और तबाही का मंजर देखकर शिवराज सिंह चौहान का गुस्सा फूट पड़ा.वे आदिवासियों के साथ धरने तक पर बैठे.क्या मप्र की डबल इंजन सरकार को कांग्रेस से ज्यादा भाजपा से ही खतरा है

केंद्रीय मंत्री ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए साफ कहा कि गरीब परिवारों को बेघर करने, उनकी फसलें चौपट करने और पीने के पानी के कुएं को मिट्टी से भरने वाले अधिकारियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा

घटनास्थल पर निरीक्षण के दौरान वन विभाग और जिला प्रशासन का कोई भी वरिष्ठ अधिकारी मौजूद नहीं था, जिस पर केंद्रीय मंत्री ने गहरा आक्रोश जताया. उन्होंने मौके से ही मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल को फोन कर पूरे मामले की जानकारी दी और कड़ी आपत्ति दर्ज कराई.

भन्नाए शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को भी फोन कर पूरी स्थिति से अवगत कराया. उन्होंने साफ किया कि वह इस संबंध में जल्द ही मुख्यमंत्री मोहन यादव से व्यक्तिगत रूप से बात कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग करेंगे.लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री से नहीं मीडिया से बात की.

शिवराज सिंह चौहन इससे पहले चेतावनी दे चुके हैँ कि यदि लाडली बहना योजना के पैसे न बढाए गए तो सरकार की खैर नहीं.नशाबँदी के मुद्दे पर भी शिवराज और डाक्टर मोहन यादव की सरकार मे पुरानी रार है.पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी सरकार से खुश नहीं.मोहन मंत्रिमंडल के सदस्य प्रहलाद पटेल,कैलाश विजयवर्गीय पहले से इठे फिर रहे हैं.

इस घटनाक्रम के अनेक संकेत हैं.पहला ये कि मुख्यमंत्री मोहन यादव तीन साल भी पार्टी के सभी नेताओं का भरोसा नहीं जीत पाए.समन्वय की कमी है या फिर जानबूझकर विरोधियों को निशाने पर रखा जा रहा है.क्या भाजपा के इस आंतरिक असंतोष का असर सरकार और संगठन पर नहीं पडेगा?क्या पार्टी दो उपचुनाव हारकर भी चेती नही है? क्या प्रदेश के नये संगठन प्रभारी विप्लव कुमार देब इस संकट से मोहन सरकार को बचा पाएंगे? क्या शिवराज प्रधानमंत्री से भी मोहन सरकार की शिकायत करेंगे?

मप्र में विधानसभा चुनाव के लिए अभी पूरे दो साल बाकी हैं.आने वाले दिनों में क्या मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव को हटना पडेगा या फिर उन्हे तमाम भाजपा नेताओं के सामने समर्पण करना पडेगा.हकीकत ये है कि प्रदेश में मोहन यादव का अपना कोई गुट नहीं था.वे खुद शिवराज सिंह चौहान के गुट में थे लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद अचानक परिस्थिति बदली.बिल्ली के भाग्य से जैसे छींका टूटता है वैसे ही डाक्टर मोहन यादव को मुख्यमंत्री का पद बिना किसी प्रत्याशा के मिला.

अब यक्ष प्रश्न यही है कि मोहन बाबू अपने सत्ता के छींके को सम्हाल भी पाएंगे या नहीं?

 

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