समग्र समाचार सेवा
कोहिमा, 7 अगस्त: नागालैंड सरकार ने केंद्र द्वारा पेश किए गए फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) को अलग संवैधानिक पहचान देने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। सरकार का कहना है कि यह कदम राज्य के क्षेत्रीय विभाजन के समान होगा और नागालैंड की संवैधानिक अखंडता को बाधित कर सकता है।
विरोध का स्वर: पहचान और संवैधानिक एकता का प्रश्न
प्रेस कांफ्रेंस में राज्य सरकार के ऊर्जा एवं संसदीय मामलों के मंत्री जी. केन्ये ने स्पष्ट किया कि पूर्वी नागालैंड पीपल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) की स्वायत्तता की मांग का सरकार समर्थन करती है, लेकिन किसी भी अलग राजनीतिक सीमा या पहचान के पक्ष में नहीं है।
उन्होंने कहा, “हम अनुच्छेद 371A के अंतर्गत स्वायत्तता का समर्थन करते हैं, लेकिन FNTA को अलग संवैधानिक दर्जा देना अस्वीकार्य है।”
अनुच्छेद 371A: विवाद का समाधान
केंद्र के सुझाव के विपरीत, केन्ये ने यह जताया कि राज्य सरकार अनुच्छेद 371A के तहत ऐसी स्वायत्त व्यवस्था चाहती है, जो असम में लागू अनुच्छेद 371B के मॉडल जैसा हो।
इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसी क्षेत्रीय परिषद में पदेन सदस्यों को वोटिंग अधिकार देना असंवैधानिक होगा।
दिल्ली दौरा: नागा वफा की याचिका
आगामी स्वतंत्रता दिवस के बाद नागालैंड सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली जाकर केंद्रीय गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय जनजातीय आयोग और अन्य संवैधानिक निकायों से मुलाकात करेगा। मंत्रालय के सामने स्वायत्तता की वैध मांग और FNTA प्रस्ताव से उत्पन्न संवैधानिक संकट स्पष्ट किया जाएगा।
आरक्षण नीति की समीक्षा: संतुलन की तलाश
राज्य सरकार ने अपनी 48 वर्षीय नौकरी आरक्षण नीति की समीक्षा करने का निर्णय लिया है। पांच प्रमुख गैर‑पिछड़ी जनजातियों ने संशोधन की मांग की है, जबकि अन्य पिछड़ी जनजातियाँ वर्तमान आरक्षण जारी रखने की वकालत कर रही हैं।
केन्ये ने बताया कि सरकारी नौकरियों का 64% हिस्सा पांच गैर‑पिछड़ी जनजातियों के अधीन है, जबकि दस पिछड़ी जनजातियाँ केवल 34% हिस्सेदारी रखती हैं।
इस असंतुलन को दूर करने के लिए सरकार एक विशेष आरक्षण समीक्षा आयोग बनाएगी, जिसमें केंद्रीय जनजाति परिषद, ENPO, टेनीमी यूनियन और प्रशासनिक अधिकारियों की सहभागिता होगी। आयोग को छह महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, और सुधार केंद्र द्वारा जनवरी 2026 में प्रस्तावित जाति‑आधारित जनगणना तक लागू किए जा सकते हैं।
नागालैंड की संवैधानिक पहचान पर लड़ाई
FNTA प्रस्ताव को लेकर नागालैंड सरकार और केंद्र के बीच उठे इस विवाद में अब केवल स्वायत्तता ही नहीं, बल्कि संवैधानिक अखंडता और पहचान की रक्षा का सवाल है। सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि वह भारत के संघीय ढाँचे में अपनी यथास्थिति बनाए रखना चाहती है और इसी के आधार पर संवैधानिक मार्ग का विकल्प चुनती है।
यह दौर सिर्फ नागालैंड का नहीं, बल्कि भारतीय राज्य‑संघ व्यवस्था में दीवाला पड़ रहे लोकतंत्रात्मक तत्त्वों की रक्षा का भी एक महत्वपूर्ण प्रसंग है।
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