पूनम शर्मा
संसद के हालिया सत्र में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने एक बेहद आक्रामक और तथ्यात्मक भाषण दिया, जिसने देश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उन ‘प्रतिबंधित’ और ‘विवादास्पद’ किताबों के जरिए राहुल गांधी और उनके पूर्वजों पर निशाना साधा, जिन्हें दशकों तक सार्वजनिक विमर्श से दूर रखा गया। दुबे का तर्क सीधा था: जिस संविधान को आज राहुल गांधी गर्व से लहराते हैं, उसे सबसे ज्यादा चोट उनके ही परिवार ने पहुँचाई थी।
संविधान बनाम आपातकाल का विरोधाभास
दुबे ने अपने भाषण में राहुल गांधी द्वारा संविधान की किताब दिखाने पर कटाक्ष करते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि 1975 से 1977 के बीच ‘स्वर्ण सिंह कमेटी’ के जरिए संविधान की आत्मा को किसने कुचला था। उन्होंने इंडियाज फर्स्ट डिक्टेटर जैसी किताबों का हवाला देते हुए याद दिलाया कि बाबा साहेब अंबेडकर ने जो संविधान गरीबों के हक के लिए बनाया था, उसे आपातकाल के दौरान अमीरों और सत्ता के हित में बदल दिया गया था। प्रेस की आजादी छीनने और राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित करने का जो काम उस दौर में हुआ, दुबे उसे आज के ‘फैक्ट चेकिंग’ के दौर की जननी मानते हैं।
प्रतिबंधित किताबों का रहस्य
दुबे के भाषण का सबसे रोचक हिस्सा वह था जहाँ उन्होंने उन किताबों का जिक्र किया जिन्हें कांग्रेस सरकारों ने समय-समय पर बैन किया। उन्होंने नेहरू के निजी सचिव एम.ओ. मथाई की किताबों और जेवियर मोरो की द रेड साड़ी का जिक्र करते हुए कहा कि इन किताबों में केवल व्यक्तिगत बातें नहीं हैं, बल्कि यह दर्ज है कि कैसे व्यक्तिगत संबंधों ने भारत की विदेश और आंतरिक नीति को प्रभावित किया। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू-गांधी परिवार के ‘निजी दरबार’ की संस्कृति ने देश का भारी नुकसान किया है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और भ्रष्टाचार के आरोप
दुबे ने 1962 के भारत-चीन युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि ‘हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट’ को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया क्योंकि वह नेहरू की गलतियों का कच्चा चिट्ठा है। उन्होंने लद्दाख और अरुणाचल की वर्तमान समस्याओं को उसी दौर की देन बताया। इसके साथ ही उन्होंने बोफोर्स घोटाले और यूपीए सरकार के दौरान हुए ‘बैंकिंग घोटाले’ और ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ पर भी हमला किया। संजया बारू की किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2004 से 2014 के बीच सत्ता का केंद्र प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं, बल्कि सोनिया गांधी का निवास था।
निष्कर्ष
निशिकांत दुबे का यह भाषण केवल एक राजनीतिक हमला नहीं था, बल्कि इतिहास के उन पन्नों को पलटने की कोशिश थी जिन्हें दबा दिया गया था। उनका मानना है कि जब तक इन किताबों और इनमें दर्ज घटनाओं पर संसद में खुलकर चर्चा नहीं होगी, तब तक देश की नई पीढ़ी को ‘गांधी परिवार के असली सच’ का पता नहीं चलेगा। दुबे का संदेश साफ है: भारत आज ‘विश्वगुरु’ बनने की ओर अग्रसर है, लेकिन इस सफर में जो देरी हुई, उसके जिम्मेदार वो ऐतिहासिक फैसले हैं जो इन विवादित किताबों में दर्ज हैं।
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