डॉ कल्पना बोरा
आज हम हिंदू, स्वयं पर गर्व करना भूल गए कि हम हिंदू हैं। हजारों वर्ष पुरानी सनातनी संस्कृति, परंपरा पर गर्व करना भूल गए। अपने महान पूर्वजों पर गर्व करना भूल गए। साहस, वीरता भूल गए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना की शताब्दी वर्ष का उत्सव पालन कर रहा है, और इसके सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने हिंदुओं को एकजुट करने के लिए, उनमें हिंदुत्व की चेतना जागृत करने के लिए पंच-परिवर्तन का दिव्य मार्ग प्रस्तावित किया है – समाज में परिवर्तन लाकर। हिंदुत्व के आचरण को हमारे दैनिक-जीवन में लाकर।
पंच परिवर्तन क्या है?
कुटुम्ब प्रबोधन – हिंदुत्व की जागृति, चेतना का प्रारम्भ परिवार से ही होगा। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन करें, भ्रमण करें, भजन करें। बच्चों को भारतीय संस्कार सिखाएँ – समाज, भारत माता के लिए अधिक त्याग करने के लिए। जहाँ सनातनी-परंपरा की निरंतरता हो –
“रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाई”
बच्चों के साथ मंदिर जाएँ, पारंपरिक विधि से त्योहार मनाएँ। मिलते समय बड़े-बुजुर्गों के पैर छुएँ। मोबाइल का उपयोग कम करें (संतान माता-पिता का अनुसरण करती है )। सोशल मीडिया (फेसबुक, इंस्टाग्राम) से जितना हो सके दूर रहें। हमें बचपन से ही अपने बच्चों को भारतीय संस्कार सिखाने चाहिए, एक साथ बैठकर रामायण, महाभारत, महाभागवत पुराण पढ़ना चाहिए। केवल संस्कारों से ही बच्चों का चरित्र बनता है, जो राष्ट्र निर्माण में योगदान देगा। माताओं की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। उदाहरण के लिए, रामायण में कई आदर्श हैं। भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, जो पुत्र, पति, भाई, मित्र, राजा कैसे व्यवहार करें और अपना धर्म कैसे निभाएँ, इसके आदर्श हैं। सभी को स्व-धर्म निभाना चाहिए। माता-पिता का धर्म है बच्चों को भारतीय संस्कार सिखाना, छात्रों का धर्म है अच्छे से पढ़ाई करना। माताओं को बच्चों के साथ अधिकतम समय व्यतीत करना चाहिए। बच्चों को सिखाएँ कि कठिन परिश्रम का कोई लघुपथ (शॉर्टकट) नहीं है:
उद्यमेन हि सिद्ध्यंति कार्याणि न मनोरथैः
हमें इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि केवल सरकार ही नौकरी देगी, बल्कि हमें किसी भी श्रम कार्य को अपनाना चाहिए, उद्यमिता अपनानी चाहिए, कृषि को उद्यमिता के रूप में लेना चाहिए। जब तक हमारे परिवार के सभी सदस्य जागृत, उद्यमी, योगदानकर्ता, त्यागी, सदाचारी, दाता, जागरूक नहीं बन जाते और दैनिक जीवन में हिंदुत्व का आचरण नहीं करते, हम पंच परिवर्तन के अगले चरण पर नहीं जा सकते।
2. सामाजिक समरसता (सामंजस्य)
– ये अगला पंच-परिवर्तन है, कि हम हिंदू समाज के किसी भी वर्ग, जाति या जन-जाति के साथ कोई भेद-भाव न करें। वेदों में कहीं जाति का उल्लेख नहीं है। वेदों में वर्ण का उल्लेख है, जो इस पर आधारित है कि कौन क्या कार्य करता है, और ये चार वर्ण एक ही पुरुष के अंग हैं (ऋग्वेद का पुरुष सूक्त)। 1966 में प्रयागराज कुंभ में, विश्व हिंदू परिषद के मंच से सभी हिंदू धर्म गुरुओं और शंकराचार्यों ने सामूहिक रूप से घोषणा की:
“हिन्दव: सोदरा सर्वे, न हिन्दू पतितो भवेत्”
अर्थात – सभी हिंदू एक ही माता की संतान (सहोदर) हैं, कोई हिंदू गिरा हुआ, अपमानित या नीचा नहीं हो सकता। हमें ऐसा आचरण करना होगा, केवल कहने से नहीं चलेगा। सभी वर्गों और जातियों के लोगों को घर बुलाएँ, उनके घर जाएँ, एक साथ भोजन करें, त्योहार मनाएँ। उनका सम्मान करें, उन पर दया न दिखाएँ। एक ही श्मशान घाट, एक ही कुआँ, एक ही मंदिर का उपयोग करें। तभी सभी हिंदू विकसित, एकजुट होंगे, और भारत हिंदू राष्ट्र के रूप में उज्ववलित होगा। उत्पीड़न के कारण इन वर्गों के हिंदू आसानी से अन्य धर्मों में परिवर्तित हो जाते हैं – लालच और चैरिटी की रणनीतियों से।
ब्रिटिश ने हमें विभाजित किया – कहा कि तुम पहाड़ों से हो अतः हिंदू नहीं हो, तुम्हारी चपटी नाक है अतः हिंदू नहीं हो, तुम जंगल में रहते हो अतः हिंदू नहीं हो, तुम्हारी आँखें छोटी हैं अतः हिंदू नहीं हो आदि। जिन वर्गों को ब्रिटिश ने चालाकी से “अनुसूचित जाति” का नाम दिया, जैसे चर्मकार, हस्तशिल्पकार, बढ़ई, कुम्हार, बुनकर, लोहार, सुनार, धातु विशेषज्ञ आदि, वे तो वास्तव में हमारे उद्यमी और औद्योगिक वर्ग थे। इस वर्ग ने हमेशा समाज को दिया है – कब हमारे मन, मस्तिष्क, दृष्टिकोण और व्यवहार में इनके प्रति सम्मान जागेगा? लगभग 1700 AD तक भी इस वर्ग का भारत की GDP (उस समय विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में एक) में बहुत महत्वपूर्ण योगदान था।
3. नागरिक कर्तव्य, राष्ट्र के लिए कर्तव्य (संविधान में भी नागरिक कर्तव्य हैं ) –
ये अगला पंच परिवर्तन है। हमें मातृभूमि, राष्ट्र के लिए समर्पित हो अपने कर्तव्य पालन करने चाहिए। कानूनों का पालन करें, ट्रैफिक और सभी नियमों का पालन करें, जहाँ ज़रूरत हो सार्वजनिक ऑफिस में पंक्ति में खड़े हों, हेलमेट पहनें (भले ही पुलिस देख न रही हो), भ्रष्टाचार में लिप्त ना हों। सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग न करें। हमारे महान भारतीय पूर्वजों, सनातनी संस्कृति, परंपरा का सम्मान करें। सभी अपना स्व-धर्म निभायें, जो सदैव राष्ट्र को समर्पित हो। नियम न मानने से हम गलती करेंगे – यह विचार आना चाहिए। अवसर मिलने पर आप जिम्मेदारी लेंगे या बहाने बनाएँगे? नियम मानेंगे या उल्लंघन करेंगे? चुनाव में मतदान करें, और उस राजनीतिक दल को वोट दें जिसने राम मंदिर बनवाया, धारा 370 हटाई, triple तलाक हटाया, और जो अवैध विदेशी अतिक्रमणकारियों से हमारी पवित्र भारत-भूमि को मुक्त करा रही है ।
4. पर्यावरण का संरक्षण और सुरक्षा –
ये अगला पंच परिवर्तन है। हम पानी, वायु, पृथ्वी, आकाश के प्रति अपना प्रेम और समर्पण दर्शायें। प्रदूषण न करें, पानी नष्ट न करें। वृक्ष लगाएँ और उनका पोषण करें, वृक्ष अपनाएँ (केवल लगाना पर्याप्त नहीं)। वृक्ष न काटें। हमारे ग्रंथों में कहा गया है – एक वृक्ष सौ पुत्रों समान है। पर्यावरण को हानि न पहुँचाएँ, उसका पोषण करें और संरक्षण करें। घरों और कार्यालयों में बिजली बचाने का प्रयास करें, क्योंकि हमारे उद्योगों को इसकी आवश्यकता है। पेट्रोल/डीजल कम उपयोग करें, कार पूलिंग करें। नदी के पानी को प्रदूषित न करें। प्लास्टिक थैले का उपयोग न करें – खरीदारी के लिए घर से कपड़े का थैला लें। पीने के लिए गिलास में पानी उतना ही लें जितना आवश्यक हो। सामाजिक समारोहों और आयोजनों में प्लास्टिक/कागजी कप, प्लेट आदि का उपयोग न करें – बल्कि धातु के बर्तनों का उपयोग करें। इससे प्लास्टिक बर्तनों की बर्बादी रुकेगी और जरूरतमंदों को बर्तन धोने का रोजगार मिलेगा। केले के पत्तों और पत्तल को प्लेट के रूप में उपयोग करें। ये सभी सतत (टिकाऊ) और पर्यावरण-अनुकूल प्रथाएँ घर से प्रारंभ होती हैं, और माताएँ इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। रिड्यूस, रीयूज, रिसाइकल का अनुसरण करें। प्लास्टिक, पॉलीथीन तथा अन्य कूड़ा ना जलायें।
5. स्व-बोध –
ये अंतिम पंच परिवर्तन हैं, ऊपर के चारों आचरणों में स्व-बोध। स्व-भाषा, स्व-भूषा, स्व-भोजन, स्व-भजन, स्व-उत्सव अपनाएँ। अपने त्योहार पारंपरिक तरीके से मनाएँ। भारत में निर्मित स्वदेशी उत्पाद अपनाएँ। हालांकि, कुछ आयातित उत्पादों का कोई विकल्प नहीं है, लेकिन हम प्रयास करें कि ऐसे गुणवत्तापूर्ण उत्पाद अपने देश में भी बनाएँ। हमारे बच्चे इसके लिए प्रयास करें। माता घरों में बच्चों के साथ मातृभाषा में ही संवाद करें। अपने बच्चों को संस्कृत सिखायें।
जब ये पंच-परिवर्तन हमारे दैनिक जीवन का आचरण बन जाएँगे – तो यही हिंदुत्व है। और हम भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने के लिए अग्रसर होंगे। वह भारत जो सदैव सभी के शांति और कल्याण की प्रार्थना करता है। यह समाज में हिंदुत्व को सशक्त करने से ही संभव हो सकेगा, पंच-परिवर्तन के माध्यम से।
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