लोकतंत्र के लिए साहित्य और निडर अभिव्यक्ति ज़रूरी: उपराष्ट्रपति

चेन्नई में रामनाथ गोयनका साहित्य सम्मान समारोह में बोले सी.पी. राधाकृष्णन

  • रामनाथ गोयनका साहित्य सम्मान का तीसरा संस्करण चेन्नई में आयोजित
  • इमरजेंसी के दौर में निडर पत्रकारिता और खाली संपादकीय का किया उल्लेख
  • राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर रचनात्मक विमर्श के लिए अख़बारों में स्थान देने का आह्वान
  • साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आधारशिला बताया

समग्र समाचार सेवा
चेन्नई | 03 जनवरी: भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को चेन्नई में आयोजित रामनाथ गोयनका साहित्य सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतंत्र के स्वस्थ रहने के लिए साहित्य, विचार और निडर अभिव्यक्ति अनिवार्य हैं। यह समारोह रामनाथ गोयनका साहित्य सम्मान का तीसरा संस्करण था।


उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह सम्मान केवल साहित्यिक उपलब्धियों का उत्सव नहीं है, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता और निर्भीक अभिव्यक्ति की स्थायी शक्ति का प्रतीक भी है। उन्होंने रामनाथ गोयनका को निडर पत्रकारिता की महान हस्ती बताते हुए उन्हें “भारतीय लोकतंत्र का विवेक रक्षक” कहा।

इमरजेंसी का दौर और निडर पत्रकारिता

अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए उपराष्ट्रपति ने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति आंदोलन और इमरजेंसी के समय का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस कठिन दौर में रामनाथ गोयनका ने बिना भय के प्रेस सेंसरशिप का विरोध किया। इमरजेंसी के दौरान प्रकाशित प्रसिद्ध खाली संपादकीय को उन्होंने मौन की शक्ति और पत्रकारिता की नैतिक दृढ़ता का सशक्त उदाहरण बताया।

राष्ट्रीय विमर्श में मीडिया की भूमिका

उपराष्ट्रपति ने समाचार पत्रों से आग्रह किया कि वे राष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों को अधिक स्थान दें। उन्होंने सुझाव दिया कि नियमित रूप से कम से कम दो पृष्ठ रचनात्मक चर्चा के लिए समर्पित होने चाहिए, ताकि राष्ट्रीय चेतना और सूचित नागरिकता को मजबूती मिल सके।

समावेशी विकास और भारतीय भाषाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की प्रगति समावेशी होनी चाहिए, जिसमें सभी भाषाएं और सांस्कृतिक परंपराएं साथ आगे बढ़ें। उन्होंने भारतीय भाषाओं और परंपराओं को बढ़ावा देने की पहलों, तथा संस्कृति मंत्रालय के ज्ञान भारतम मिशन का उल्लेख किया, जो प्रौद्योगिकी और एआई के माध्यम से भारत की ज्ञान परंपरा के संरक्षण पर केंद्रित है।


साहित्य, समाज और जिम्मेदारी

उपराष्ट्रपति ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण और सभ्यतागत मूल्यों का वाहक रहा है। तेज़ी से बदलते सामाजिक और तकनीकी दौर में लेखकों और बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब सबसे बेहतर फलती है, जब उसका उपयोग जिम्मेदारी, सहानुभूति और जवाबदेही के साथ किया जाए।

पुरस्कार विजेता

इस समारोह में प्रख्यात कन्नड़ लेखक डॉ. चंद्रशेखर कंबारा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया।

सर्वश्रेष्ठ फिक्शन: सुबी ताबा (अरुणाचल प्रदेश)

सर्वश्रेष्ठ नॉन-फिक्शन: शुभांशी चक्रवर्ती

सर्वश्रेष्ठ डेब्यू: नेहा दीक्षित

उपराष्ट्रपति ने सभी विजेताओं को बधाई देते हुए कहा कि उनका साहित्य भारत के बौद्धिक परिदृश्य को समृद्ध करता है और युवा पीढ़ी को गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करेगा।

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