इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट में दिल्ली दंगे 2020 के छह वर्ष पर संगोष्ठी
शासन परिवर्तन और सूचना युद्ध पर मंथन
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 21 फरवरी :दिल्ली दंगों 2020 के छह वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर Indian Law Institute में ‘ग्रुप ऑफ इंटेलेक्चुअल्स एंड एकेडेमिशियन्स (GIA)’ द्वारा एक दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य वर्ष 2020 में हुए दिल्ली दंगों को शासन परिवर्तन के प्रयासों तथा सूचना युद्ध की व्यापक रणनीतियों के परिप्रेक्ष्य में समझना था।
इस अवसर पर पूर्व पुलिस आयुक्त एस.एन. श्रीवास्तव ने कहा कि दिल्ली दंगे वैश्विक स्तर पर देखे जाने वाले उस पैटर्न का हिस्सा थे, जिसमें दंगों का उपयोग शासन परिवर्तन के उपकरण के रूप में किया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे घटनाक्रमों के दौरान पुलिस के सामने बहुआयामी चुनौतियाँ होती हैं। उनके अनुसार, दिल्ली में दंगाइयों को यह अपेक्षा थी कि पुलिस की कठोर कार्रवाई से स्थिति और भड़केगी तथा व्यापक विरोध को हवा मिलेगी, जैसा कि अन्य देशों में देखने को मिला है।
पूर्व रॉ प्रमुख संजीव त्रिपाठी ने ‘पाँचवीं पीढ़ी के सूचना युद्ध’ की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक हाइब्रिड संघर्षों में दंगे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं होते, बल्कि वे नैरेटिव निर्माण, मनोवैज्ञानिक अभियानों और रणनीतिक दुष्प्रचार का हिस्सा बन जाते हैं। उन्होंने बताया कि सूचना के प्रसार और डिजिटल माध्यमों के प्रभाव ने ऐसे संघर्षों को अधिक जटिल बना दिया है।
राजदूत वीना सिकरी ने तथाकथित ‘बांग्लादेश मॉडल’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे घटनाक्रमों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नैरेटिव के नियंत्रण का होता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धारणा निर्माण और संदेश-प्रबंधन राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, यदि किसी देश की छवि को लक्षित तरीके से प्रभावित किया जाए तो उसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
GIA की संयोजक मोनिका अरोड़ा ने अपने संबोधन में कहा कि दिल्ली दंगे एक ‘प्रयोग’ के रूप में देखे जा सकते हैं, जिनका उद्देश्य शासन को अस्थिर करना था। उन्होंने इस विषय पर निरंतर शैक्षणिक अध्ययन, दस्तावेजीकरण और जन-जागरूकता अभियानों की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रमुख नागरिक चंदर वाधवान ने अपने विश्लेषण में तथाकथित ‘डीप स्टेट’ की अवधारणा और उसके संभावित प्रभावों पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि ऐसे जटिल घटनाक्रमों को समझने के लिए बहुस्तरीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
कार्यक्रम में सेवानिवृत्त राजनयिकों, पूर्व नौकरशाहों, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, अधिवक्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। अंत में यह संकल्प व्यक्त किया गया कि GIA दिल्ली दंगों से जुड़े विषयों पर शोध, जन-जागरूकता और तथ्यात्मक विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए अपने प्रयास जारी रखेगा।
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