आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत बोले: ‘सेवानिवृत्ति पर विवाद निराधार, संघ की यात्रा नए क्षितिज की ओर’

समग्र समाचार सेवा
नागपुर, 29 अगस्त: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने सोमवार को नागपुर में आयोजित कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ में संगठन की कार्यप्रणाली, भूमिका और भविष्य की दिशा पर विस्तार से बात की। इस दौरान उन्होंने खासतौर पर सेवानिवृत्ति के मानदंडों पर चल रहे विवादों पर अपनी प्रतिक्रिया दी और स्पष्ट किया कि संघ में सेवा भाव ही सर्वोपरि है, न कि पद और आयु सीमा।

सेवानिवृत्ति को लेकर उठे सवाल

हाल ही में मीडिया और कुछ राजनीतिक हलकों में यह चर्चा रही कि संघ अपने वरिष्ठ पदाधिकारियों के लिए किसी प्रकार की आयु सीमा या अनिवार्य सेवानिवृत्ति नियम लागू करने पर विचार कर रहा है। इस पर मोहन भागवत ने कहा:

“संघ में सेवानिवृत्ति का कोई सवाल ही नहीं है। यहां कार्यकर्ता जीवनभर सेवा करते हैं। हाँ, कार्य विभाजन की दृष्टि से आयु और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर जिम्मेदारियाँ बदली जा सकती हैं, लेकिन सेवा से मुक्त होने का कोई नियम नहीं है।”

भागवत ने स्पष्ट किया कि यह विवाद सिर्फ भ्रम और अफवाहों के कारण पैदा हुआ है।

 ‘100 वर्ष की यात्रा’ और नए लक्ष्य

कार्यक्रम में मोहन भागवत ने संघ की 100 वर्ष की यात्रा को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह संगठन अब नए क्षितिज की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, शिक्षा, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक उत्थान को आगे ले जाना है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज देश जिस वैश्विक परिदृश्य से गुजर रहा है, उसमें भारत की भूमिका और संघ की जिम्मेदारी दोनों ही और अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं।

विरोध और समर्थन दोनों

भागवत के इस बयान पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। जहां समर्थक इसे संघ की लंबी परंपरा और सेवा भाव का प्रतीक बता रहे हैं, वहीं आलोचकों का कहना है कि संघ को संस्थागत सुधार और पारदर्शिता के लिए अधिक ठोस कदम उठाने चाहिए।

विशेषज्ञ मानते हैं कि संघ की यह स्पष्टता 2025 के बाद होने वाले संगठनात्मक बदलावों और आगामी राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकती है।

संगठन की दिशा और समाज की अपेक्षा

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि संघ केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन है। उन्होंने कहा:

“हमारा उद्देश्य केवल सत्ता या चुनाव नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग तक सेवा और राष्ट्रभावना पहुँचाना है। आने वाले समय में संघ शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में और अधिक सक्रिय होगा।”

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यह बयान स्पष्ट करता है कि सेवानिवृत्ति को लेकर चल रहा विवाद वास्तविकता से परे है। संघ अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर न केवल अपनी परंपराओं को मजबूत कर रहा है, बल्कि भविष्य की दिशा भी तय कर रहा है।
आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि संगठन किस तरह से नए सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों के बीच अपनी भूमिका को और मजबूत करता है।

 

 

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.