मेरठ की यूनिवर्सिटी में बवाल: पेपर में नक्सली-आतंकी संगठनों से की गई RSS की तुलना, प्रोफेसर ने मांगी माफी
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,5 अप्रैल। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की एक यूनिवर्सिटी में एक प्रश्नपत्र को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक यूनिवर्सिटी परीक्षा के पेपर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की तुलना नक्सली और आतंकी संगठनों से किए जाने पर छात्रों, शिक्षकों और राजनीतिक संगठनों में आक्रोश फैल गया। भारी विरोध के बाद संबंधित प्रोफेसर ने सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली है, लेकिन बवाल थमता नजर नहीं आ रहा।
यह विवाद मेरठ की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में आयोजित स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान की परीक्षा के एक प्रश्न से जुड़ा है। प्रश्न में छात्रों से पूछा गया था:
“RSS, नक्सली और आतंकी संगठनों के उदय में क्या समानताएं हैं?”
जैसे ही यह प्रश्न सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लोग भड़क उठे। आलोचकों का कहना है कि यह न केवल RSS जैसे वैधानिक और राष्ट्रवादी संगठन की छवि को धूमिल करने का प्रयास है, बल्कि छात्रों को वैचारिक रूप से भ्रमित करने की भी कोशिश है।
इस प्रश्न को लेकर ABVP, BJP और RSS से जुड़े संगठनों ने यूनिवर्सिटी के बाहर प्रदर्शन किया और दोषी प्रोफेसर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। भाजपा के कुछ नेताओं ने इसे “शैक्षणिक संस्थानों में वामपंथी मानसिकता की गहरी घुसपैठ” करार दिया।
बीजेपी प्रवक्ता ने कहा,
“शैक्षणिक स्वतंत्रता के नाम पर राष्ट्रवादी संगठनों को आतंकवादियों के समकक्ष रखना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। छात्रों को गुमराह करना शिक्षा नहीं, राजनीतिक एजेंडा है।”
विवाद बढ़ने पर प्रश्नपत्र तैयार करने वाले प्रोफेसर ने एक लिखित माफीनामा जारी किया। उन्होंने कहा:
“मेरे इरादे किसी संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाने के नहीं थे। यह प्रश्न अकादमिक विमर्श के संदर्भ में तैयार किया गया था, लेकिन यदि इससे किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो मैं क्षमा चाहता हूं।”
यूनिवर्सिटी प्रशासन ने फिलहाल मामले की जांच के लिए एक आंतरिक समिति गठित कर दी है और कहा है कि रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
जहां एक ओर कुछ छात्र इस प्रश्न को “विचार की स्वतंत्रता” से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं अधिकांश छात्रों का मानना है कि परीक्षा जैसे गंभीर मंच पर इस तरह के संवेदनशील विषयों को उठाना भ्रामक और अनुचित है।
वहीं कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि अकादमिक विमर्श में विविध विचारों की जगह होनी चाहिए, लेकिन प्रश्नों की भाषा और संदर्भ बेहद संवेदनशील ढंग से तय किए जाने चाहिए।
मेरठ यूनिवर्सिटी का यह मामला भारत में शिक्षा और विचारधारा के बीच टकराव की एक और मिसाल बन गया है। जहां एक ओर विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र विचारों को बढ़ावा देने की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर छात्रों को किसी भी तरह के राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे से सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है। यह घटना शिक्षा और विचारधारा के बीच संतुलन साधने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
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