भाजपा से हाल ही में हारे संजय शुक्ला, विशाल पटेल हुए भाजपाई
सुदर्शन और मनोज पटेल की राजनीतिक ज़मीन ख़तरे में, दोनों के स्थायी प्रतिद्वंद्वी भाजपा में आये
नितिनमोहन शर्मा
चुनाव के मैदान में जिन नेताओ से पार्टी के कार्यकर्ता दमदारी से लड़े, वे ही नेता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बगल में जाकर खड़े हो गए हैं। जिन नेताओ से पार्टी का ” देवदुर्लभ ” सालो से दो दो हाथ कर रहा था, अब वे दोनों हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़े हो गए हैं। बगैर किसी मेहनत, संघर्ष और विचार के वे नेता “विचारधारा आधारित पार्टी” के बड़े नेता हो गए। सदैव सदिग्ध निष्ठा वाले एकदम, एक ही झटके में निष्ठावान भी हो गए। भगवे दुपट्टे धारण हो गए और पार्टी ने भी फूल बरसा दिए। लोकसभा का चुनाव जो आ गया हैं।
दल और दलीय निष्ठाओ को ताक में रखने के दिन जो आ गए। लिहाजा इंदौर इससे कैसे अछूता रह सकता हैं? अहिल्यानगरी के दो पूर्व कांग्रेस विधायक अब भाजपाई हो गए। एक संजय शुक्ला, दूजे विशाल पटेल। दोनों नेता अपने “उस्ताद” के संग कांग्रेस की “न्याय यात्रा” को धता बता “मोदी परिवार” का हिस्सा हो गए। अब इंदौर में भाजपा का कुनबा भारी भरकम हो गया। इसका बोझ भी अब उन्ही देव दुर्लभो को उठाना हैं, जो टुकर टुकर ये ” तमाशा ” देख रहा हैं। मोन रहकर, किंकर्तव्यविमूढ़ होकर।
शनिवार का दिन कांग्रेस में शनि की ढय्या साबित हुआ। शनि न्याय के देवता है और कांग्रेस की सड़क पर न्याय यात्रा ही चल रही हैं। ऐसे में पार्टी के साथ ” अन्याय ” हो गया। उसके दिग्गज नेता सुरेश पचौरी ने कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया। साथ मे अपने खास पूर्व विधायक संजय शुक्ला को ले गए। संजय अपने साथ अपने खास सखा पूर्व विधायक विशाल पटेल को भी भाजपा में ले गए। प्रदेश कार्यालय में शनिवार को एक तरह से जश्न का माहौल था। बिन मौसम, बिन कारण, बिन अवसर। सबको हतप्रभ करते हुए भाजपा ने कांग्रेस की कमर ही तोड़ दी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को हतप्रभ करते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने ये खेल खेला। बगल में जरूर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव व पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खड़े थे लेकिन विजयी मुस्कान सिर्फ “वीडी भैय्या” के चेहरे पर ही तैर रही थी।
वे एक के बाद एक कांग्रेसियों का शिकार करते जा रहे हैं और मोदी की उस मंशा को पूर्ण कर रहे है जिससे कहाँ गया था कि पंच-सरपंच से लेकर हर उस नेता को कांग्रेस से भाजपा में लाओ जिसका जमीन पर थोड़ा बहुत भी जनाधार हैं। सजंय, विशाल का शिकार भी इसी रणनीति का हिस्सा बना और कांग्रेस हाथ मलती रह गई। समूची पार्टी में सन्नाटा पसर गया। जैसे सांप सूंघ गया। उधर भाजपाई आंगन में आतिशबाजी के साथ ढोल बजते रहें। भोपाल के बाद इस जश्न का साक्षी देर रात तक इंदौर का दीनदयाल भवन भी बना और बाणगंगा का मरीमाता चौराहा भी बना। जहां खूब आतिशबाजी हुई। दोनों नेताओं ने भी भाजपा के दफ्तर की चौखट को नमन पर स्वयम को ” नमो” से जोड़ लिया। दोनों नेताओं में राम मंदिर से कांग्रेस की दूरी को इसका कारण बताया।
बगैर लड़े-जीते “बड़े गांव” के “पटेल” बने विशाल
बड़ा गांव यानी देपालपुर। मालवा में देपालपुर का ये ही नाम चलन में हैं। उसी बड़े गांव के पटेल अब विशाल पटेल बम गए। बगेर लड़े रहें चुनाव जीते वे बड़े गांव की ” पटलाई ” ले आये। देपालपुर के मोजूदा पटेल यानी विधायक मनोज पटेल के समक्ष असहज स्थिति पैदा हो गई। विशाल पटेल और उनका कुनबा यहाँ मनोज का चीर प्रतिद्वंद्वी रहा हैं। इसी कारण मनोज यहां हार जीत के बाद भी भाजपा में देपालपुर के पटेल बने हुए थे। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खासमखास भी थे। अब शिवराज के बिदा होते ही उनके बड़े गांव में भाजपा ने ही एक और पटेल मैदान में उतार दिया। यानी स्व निर्भयसिंह पटेल ” निर्भय दादा” की विरासत के भी यहाँ वैसे ही दो हिस्से हो गए, जैसे विधानसभा 1 में स्व विष्णुप्रसाद शुक्ला की राजनीतिक विरासत के हुए।
“संजू” ने संभाली “बाबूजी” की विरासत
संजय शुक्ला यानी संजू बाबा ने आखिरकार अपने बाबूजी की राजनीतिक विरासत को सँभाल ही लिया। बाबूजी यानी स्व विष्णुप्रसाद शुक्ला भाजपा के जनसंघ के जमाने के कद्दावर नेता रहें हैं। वे स्थानीय स्तर पर भाजपा के संस्थापकों में से एक रहें हैं। जब भाजपा के पास नेताओ का टोटा था, उस दौर से स्व शुक्ला भाजपा को संभाले हुए थे। अपने दमखम व संसाधन के दम पर उस दौर की भाजपा के सबसे मजबूत स्तंभ थे। पुत्र संजय शुक्ला ने 1993 के वक्त कांग्रेस का दामन थाम लिया। दूसरे पुत्र राजेन्द्र शुक्ला ने बाबूजी की विरासत को आगे बढ़ाने के बहुतेरे प्रयास किये पर सफलता आशिंक ही हाथ आई।
बाबूजी की इस भाजपाई विरासत को परिवार के ही गोलू शुक्ला ने मजबूती दी। बाबूजी के अवसान के बाद गोलू ही शुक्ला परिवार में भाजपा के झंडाबरदार हो गए थे। वे भाजयुमो अध्यक्ष, आईडीए उपाध्यक्ष से लेकर विधायक भी बन गए थे। अब संजय शुक्ला ने आकर परिवार की विरासत को संभाल लिया। इसलिए ही उन्होंने अपने भाजपा प्रवेश को परिवार में लौटना करार दिया और उनके सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर इसी बात पर फोकस किया कि ये पुराने परिवार में वापसी हैं। अब बाबुजी की भाजपाई विरासत के शुक्ला परिवार में दो दो दावेदार, हिस्सेदार हो गए हैं। अब जब भी भाजपा से शुक्ला परिवार को कुछ मिलेगा तो दोनों में से किसी एक को ही संतुष्ट होना होगा।
सुदर्शन-मनोज हतप्रभ, निराश भी
भाजपा में जहां गाजे बाजे के साथ कांग्रेस के दो पूर्व विधायकों का आगमन हुआ वही भाजपा के दो नेताओ के समक्ष असमंजस की स्थिति भी पैदा हो गई। इसमे एक है देपालपुर के मोजूदा विधायक मनोज पटेल और दूसरे संजय शुक्ला से ही हारे पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता। दोनों नेता पार्टी के इस फैसले से हतप्रभ रह गए। निराश भी हुए। इन दोनों नेताओं ने अपने इन परम्परागत प्रतिद्वंदियों से जमकर कीला लड़ाकर भाजपा का जनाधार अपने अपने इलाके में बनाया था। सुदर्शन तो दो कदम आगे थे और उन्होंने तो शुक्ला परिवार पर निजी हमले तक किये। यहां तक कि स्व विष्णुप्रसाद शुक्ला तक की छवि धूमिल करने के प्रयास तक किये गए। अखबारों में विज्ञापन तक जारी किए गए। अब वो ही प्रतिद्वंद्वी आकर उनकी पार्टी में आकर बगल में खड़े हो गए हैं। सिवाय ” फीकी मुस्कान” के जरिये स्वागत करने के अलावा भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने इनके लिए कुछ छोड़ा नही हैं। देपालपुर ओर विधानसभा 1 सीट एक तरह पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के कोटे की ही थी। दोनों सीट पर उनके ही समर्थक नेता को ही टिकट मिलता रहा हैं। अब इन दोनों नेताओं को शिवराज के नही रहने का खामियाजा उठाना पड़ रहा हैं।
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