खाकी और काले कोट का टकराव – शाहदरा थाने का वह पूरा घटनाक्रम-भाग 1

विजय पाल सिंह

​कानून के दो सबसे अहम स्तंभ—पुलिस और वकील—जब आमने-सामने आ जाएं, तो कानून-व्यवस्था का क्या हश्र होता है, इसका जीता-जागता उदाहरण हाल ही में दिल्ली के शाहदरा थाने में देखने को मिला। पार्किंग के एक मामूली विवाद ने देखते ही देखते ऐसा रूप ले लिया, जिसने पुलिस के मनोबल, वकीलों के विशेषाधिकार और सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
​विवाद की जड़ और थाने में मारपीट। ” वायरल विडियो दिनांक 23 अक्टूबर 42 से सेंकन्ड”

घटना की शुरुआत शाहदरा थाना क्षेत्र में एक दुकान के सामने पार्किंग को लेकर दो पक्षों के बीच हुए मामूली झगड़े से हुई। पीसीआर कॉल के बाद पुलिस दोनों पक्षों को थाने ले आई। लेकिन मामला तब बिगड़ गया जब वकीलों की वेशभूषा में कुछ लोग थाने पहुंचे। उन्होंने दूसरे पक्ष के एक युवक (जिसके साथ एक महिला भी थी) को चिह्नित किया और सरेआम थाने के भीतर उसके साथ मारपीट शुरू कर दी। उपलब्ध वीडियो में यह दिखाई देता है कि पिटने वाले युवक के हाथ में एक नेमप्लेट है जो पुलिस अफसर अपनी मेज पर रखते हैं। देखने से लगता है कि अपनी पिटाई के दौरान उस युवक ने अपने बचाव में उसी नेमप्लेट से वकील पर वार किया होगा। यह किसी भी आम आदमी की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया लगती है। चार-पांच लोग अगर एक व्यक्ति को पीट रहे हैं समझा जा सकता है कि पिटने वाले वाले व्यक्ति ने वार किया होगा या प्रतिवार।

​पर्दे के पीछे की कहानी: धमकियां और पुलिस का विशेषाधिकार:

इस मारपीट के बाद वकीलों ने शाहदरा पुलिस पर दबाव बनाया कि उस युवक के खिलाफ धारा 110 बी एन एस
के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए। साथ ही, खुलेआम धमकी दी गई कि जब पुलिस उसे कोर्ट में पेश करेगी, तो वकील उसे कड़कड़डूमा कोर्ट में ही “देख लेंगे”।
पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन उस युवक को गिरफ्तार नहीं किया। दरअसल, किसी भी मामले में गिरफ्तारी करना या न करना कानूनन पुलिस का विशेषाधिकार है; कोई भी बाहरी दबाव उन्हें इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता। खासकर तब, जब आरोपी की जान को कोर्ट परिसर में खतरा हो। जब वकीलों को पता चला कि गिरफ्तारी नहीं हुई है, तो उनका गुस्सा भड़क गया। और उन्होंने कड़कड़डूमा कोर्ट में ही एक ‘नायब कोर्ट’ (पुलिसकर्मी) को बंधक बना लिया और एसएचओ को कोर्ट में तलब करने की मांग की। बड़ी मुश्किल से चौकी इंचार्ज ने उस पुलिसकर्मी को छुड़ाया। ऐसा एसीपी मनस्वी अपनी विडियो में बताते हैं

​शाहदरा थाने में वकीलों का हंगामा और अफ़सरों से हाथापाई:

अगले दिन ( एस एच ओ शाहदरा आफिस वायरल विडियो दिनांक 24 अक्टूबर 2.15 मिनट ), वकीलों का एक समूह शाहदरा थाने में एसएचओ के कार्यालय में घुस गया। वहां सिविल वर्दी में कार्यवाहक एसीपी मनस्वी वशिष्ठ बैठे थे, जो अपना रूटीन काम कर रहे थे। वीडियो की शुरुआत में वे फोन पर बात करते हुए अपने एक जूनियर को अपनी आधिकारिक ग्लॉक पिस्टल के बारे में कुछ निर्देश देते दिखाई दे रहे हैं। और यह एक नितांत विभागीय बातचीत प्रतीत होती है, जिसे कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति किसी भी कल्पना से ‘धमकी’ नहीं मान सकता।

धीरे-धीरे वहां वकीलों की संख्या 3-4 से बढ़कर 10-12 हो गई। वकीलों का रवैया आक्रामक होने लगा और हद तो तब पार हो गई जब एक वकील ने एसीपी के बगल में खड़े एसएचओ को बाजू से पकड़कर हाथापाई की। इस भीषण आक्रामकता के बीच एसीपी मनस्वी वशिष्ठ बेहद संयम बरतते हुए उन्हें शांत करने की कोशिश करते वीडियो में नजर आते हैं।
इस घटनाक्रम को जिस तरह से वकील पेश कर रहे हैं, एक नितांत आफिशियल वार्तालाप को धमकी बता रहे हैं, यह दर्शाता है कि वकीलों को अपने गलत किये का अहसास है मगर कहीं न कहीं एक झूठी और काल्पनिक परिभाषा की आड़ में अपने आपको सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।

​ दबाव की राजनीति और पुलिस का गिरता मनोबल

इस घटना के बाद वकीलों ने जॉइंट सीपी (ईस्टर्न जोन) के कार्यालय पर धमकियों भरा प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में वकील एस एच ओ शाहदरा और एसीपी मनस्वी के ट्रांसफर की मांग पर दबाव बनाते दिखाई दे रहे हैं। इसी दबाव में आकर अगले ही दिन एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और एसएचओ शाहदरा, दोनों का तबादला कर दिया गया और उनकी ACR (Annual Confidential Report) में निगेटिव एंट्री दर्ज करने के निर्देश दिए गए। हालांकि, तबादले से पहले एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने स्वयं शिकायतकर्ता बनकर वकीलों द्वारा एस एच ओ शाहदरा के साथ manhandling के बारे में शाहदरा थाने में वकीलों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था। दोनों अफसरों के ट्रांसफर के बाद में यह भी अफवाह उड़ी कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने वकीलों को वह केस वापस लेने का आश्वासन भी दे दिया है।

इन घटनाओं और सोशल मीडिया पर वकीलों द्वारा दी जा रही खुली धमकियों “आगे जाकर देख लेने” जैसी बातें और पुलिस विभाग के सीनियर अधिकारियों का दबाव में आकर काम करने के तरीकों ने पुलिस फोर्स के मनोबल को रसातल में पहुंचा दिया है। इसी कुंठा का नतीजा यह हुआ कि अगले रोज, बिल्कुल अप्रत्याशित रूप से, सारे नियम कानूनों को ताक पर धरकर करीब 500 पुलिस वाले जिनमें महिला पुलिस भी थी, पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन करने पहुंच गए।
क्रमशः

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