पूनम शर्मा
भूमिका भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह मतभेद व्यक्तिगत आक्षेपों और अभद्र टिप्पणियों का रूप ले लेते हैं, तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। हाल ही में लखनऊ से सामने आई घटना, जहाँ समाजवादी पार्टी की एक महिला नेता द्वारा बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती के खिलाफ फेसबुक पर आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणी की गई, इसी गिरते राजनीतिक स्तर का प्रमाण है। यह मामला केवल एक पोस्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ‘सपा बनाम बसपा’ और ‘पिछड़ा बनाम दलित’ की राजनीति को एक बार फिर चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।
घटनाक्रम और कानूनी कार्रवाई
लखनऊ के कृष्णा नगर थाने में समाजवादी पार्टी की नेत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। आरोप है कि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के लिए जिन अपशब्दों का प्रयोग किया, वे न केवल महिला विरोधी हैं बल्कि एक विशिष्ट समुदाय की भावनाओं को भी आहत करने वाले हैं। राजनीति में आलोचना नीतियों की होनी चाहिए, न कि व्यक्ति के अस्तित्व या उसकी पृष्ठभूमि की। यह विडंबना ही है कि एक महिला नेता ही दूसरी कद्दावर महिला नेता के सम्मान पर प्रहार कर रही है।
PDA के नारों और जमीनी हकीकत के बीच विरोधाभास
समाजवादी पार्टी वर्तमान में ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के साथ खुद को दलितों के मसीहा के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। लेकिन इस तरह की घटनाएं उस नैरेटिव को गहरा धक्का पहुँचाती हैं।
सवाल अखिलेश यादव की चुप्पी पर: जनता और विश्लेषकों का पूछना लाजमी है कि जब ऐसी अभद्र टिप्पणी सामने आई, तो पार्टी नेतृत्व ने तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की?
वोट बैंक बनाम सम्मान: क्या दलितों का सम्मान केवल चुनाव के समय ‘वोट’ के लिए है? अगर पार्टी के कार्यकर्ता सार्वजनिक मंचों पर दलित नेतृत्व को अपमानित करते हैं, तो ‘PDA’ का नारा केवल एक चुनावी जुमला बनकर रह जाता है।
गेस्ट हाउस कांड की कड़वी यादें
चर्चाओं में अक्सर 1995 के ‘लखनऊ गेस्ट हाउस कांड’ का जिक्र आता है। आलोचकों का मानना है कि इस नई घटना ने यह साबित कर दिया है कि दशकों बाद भी मानसिकता में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। जब भी समाजवादी खेमे से मायावती जी के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी आती है, तो दलित समाज में असुरक्षा और पुराने जख्मों की कसक फिर से उभर आती है। भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे पर घेराबंदी करते हुए इसे सपा की ‘सामंती सोच’ करार दिया है।
सोशल मीडिया और जिम्मेदारी का अभाव
आज के दौर में सोशल मीडिया एक ऐसा हथियार बन गया है जिसका इस्तेमाल राजनीतिक कार्यकर्ता अपने नेतृत्व को खुश करने के लिए ‘ट्रोलिंग’ के रूप में करते हैं। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि अभद्र भाषा किसी भी पार्टी की छवि को सुधारने के बजाय बिगाड़ती है। मायावती जी ने हाल ही में कई मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखी है, जिससे राजनीतिक समीकरण प्रभावित हुए हैं। किसी की राजनीतिक राय से असहमति हो सकती है, लेकिन उस असहमति को गाली-गलौज में बदलना कायरता और वैचारिक शून्यता का प्रतीक है।
क्या केवल ‘एक वर्ग’ की राजनीति रह गई है?
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या समाजवादी राजनीति के केंद्र में आज भी केवल एक विशेष वर्ग का वर्चस्व है? क्या दलितों को बराबरी का साझीदार बनाने के बजाय उन्हें केवल अपने पीछे चलाने की मंशा रखी जाती है? अगर कोई दलित महिला नेता अपनी स्वतंत्र पहचान बनाती है या अपने वोट बैंक पर पकड़ रखती है, तो उसे अपमानित करना यह दर्शाता है कि सत्ता का अहंकार लोकतांत्रिक गरिमा पर भारी पड़ रहा है।
निष्कर्ष: सुधार की आवश्यकता
राजनीति को नफरत और गाली-गलौज से मुक्त करने की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व की है। अगर अखिलेश यादव वास्तव में दलित समाज को साथ लेकर चलना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी पार्टी के भीतर पनप रही इस तरह की अराजक और अपमानजनक प्रवृत्तियों पर लगाम लगानी होगी।
मायावती केवल एक दल की नेता नहीं हैं, बल्कि वे करोड़ों दलितों की अस्मिता का प्रतीक हैं। उनका अपमान उस पूरे वर्ग का अपमान है जिसे सम्मान की मुख्यधारा में लाने के लिए डॉ. अंबेडकर और कांशीराम जी ने संघर्ष किया था। समय आ गया है कि राजनीति ‘मर्यादा’ के घेरे में वापस लौटे, वरना जनता के बीच ये ‘फोटो के सौदागर’ और ‘वोट की राजनीति’ करने वाले चेहरे पूरी तरह बेनकाब हो जाएंगे।
Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.