छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर सत्य पाल जैन ने जारी की सर्वे रिपोर्ट
'केतावा' की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: 93.5% छात्र मानसिक स्वास्थ्य को मानते हैं महत्वपूर्ण, लेकिन केवल 15.9% ही लेते हैं पेशेवरों की सलाह।
सत्य पाल जैन ने ‘केतावा’ संस्था की सर्वे रिपोर्ट जारी की।
43.1% छात्रों को नहीं पता कि मानसिक मदद के लिए कहाँ जाएं।
शैक्षणिक संस्थानों में सुलभ और गोपनीय सहायता प्रणाली की मांग।
समग्र समाचार सेवा
चंडीगढ़, 22 अक्तूबर: विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य, उनकी सोच और व्यावहारिक सहायता की वास्तविक स्थिति को दर्शाती एक महत्वपूर्ण सर्वे रिपोर्ट आज चंडीगढ़ में जारी की गई। ‘केतावा – सेंटर फॉर बिहेवियर चेंज’ (Ketawa – Centre for Behaviour Change) द्वारा तैयार की गई इस शोध रिपोर्ट का शीर्षक “बियॉन्ड अवेयरनेस: व्हाट यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स नो, फील एंड डू अबाउट मेंटल हेल्थ” (Beyond Awareness: What University Students Know, Feel and Do About Mental Health) है। इस रिपोर्ट का औपचारिक विमोचन भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल, वरिष्ठ अधिवक्ता, पूर्व सांसद और भारतीय विधि आयोग के पूर्व सदस्य श्री सत्य पाल जैन द्वारा किया गया।
इस विशेष कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं चंडीगढ़ प्रशासन की सलाहकार परिषद के सदस्य श्री देवेश मौदगिल, पंजाब विश्वविद्यालय के ‘पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर’ की निदेशक प्रो. कुमूल अब्बी, ‘सेंटर फॉर सोशल वर्क’ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गौरव गौर, और वरिष्ठ अनुसंधान विश्लेषक डॉ. सुखबीर सिंह समेत कई गणमान्य विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।
सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े: जागरूकता और मदद मांगने के बीच बड़ा अंतर
यह विस्तृत सर्वे रिपोर्ट विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ रहे छात्रों के बीच मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और वास्तव में सहायता प्राप्त करने के बीच मौजूद एक बड़े अंतर को रेखांकित करती है। रिपोर्ट के आंकड़े दर्शाते हैं कि आज का युवा मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजग तो है, लेकिन सामाजिक बाधाओं और जानकारी के अभाव के कारण विशेषज्ञों तक नहीं पहुंच पाता।
महत्व की समझ: सर्वे में शामिल 93.5 प्रतिशत छात्रों ने माना कि मानसिक स्वास्थ्य भी शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है।
पेशेवर सलाह की कमी: इसके बावजूद केवल 15.9 प्रतिशत छात्रों ने ही कभी किसी मनोचिकित्सक, काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से परामर्श प्राप्त किया है।
मार्गदर्शन का अभाव: लगभग 43.1 प्रतिशत छात्रों ने स्वीकार किया कि तनाव या मानसिक समस्या होने पर उन्हें यह जानकारी ही नहीं होती कि सही मदद प्राप्त करने के लिए कहाँ जाना चाहिए।
सामाजिक कलंक का डर: 31 प्रतिशत विद्यार्थियों ने कहा कि समाज में लोग उन्हें जज करेंगे या गलत समझेंगे, इसी डर (Stigma) से वे अपनी समस्याओं को किसी के साथ साझा नहीं करते।
सेवाओं की जानकारी: केवल 36.2 प्रतिशत छात्रों को ही अपने परिसर या आसपास उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और हेल्पलाइन्स के बारे में स्पष्ट जानकारी थी।
श्री सत्य पाल जैन का वक्तव्य: “केवल जागरूकता नहीं, व्यावहारिक कदम जरूरी”
रिपोर्ट जारी करते हुए मुख्य अतिथि श्री सत्य पाल जैन ने कहा कि युवाओं और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है। इसके लिए परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों, शिक्षक वर्ग और पूरे समाज को मिलकर आगे आना होगा और इस विषय पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।
श्री जैन ने कहा, “इस तरह की ग्राउंड रिपोर्ट छात्रों की असली चिंताओं और उनके मन के डर को सामने लाने में बेहद मददगार साबित होती हैं। अब समय आ गया है कि हमारी संस्थाएं केवल पोस्टर चिपकाने या जागरूकता कार्यक्रम चलाने तक सीमित न रहें। हमें परिसरों के भीतर ऐसी व्यावहारिक, संवेदनशील, सस्ती और आसानी से उपलब्ध सहायता प्रणालियां स्थापित करनी होंगी जहाँ छात्र बिना किसी झिझक के आ सकें।”
कैंपस स्तर पर पारदर्शी और मजबूत प्रणाली की आवश्यकता
कार्यक्रम में उपस्थित चंडीगढ़ प्रशासन की सलाहकार परिषद के सदस्य श्री देवेश मौदगिल ने कहा कि यह शोध रिपोर्ट पूरे विश्वविद्यालय परिसर के स्तर पर एक सुव्यवस्थित कार्यप्रणाली अपनाने का ठोस सुझाव देती है। उन्होंने जोर दिया कि संस्थानों में ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली हर छात्र को स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
उन्होंने कहा कि रोजमर्रा के जीवन में मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत को सामान्य (Normalize) बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा, फैकल्टी मेंबर्स, हॉस्टल वार्डन और सहपाठियों (Peers) के नेटवर्क को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे शुरुआती लक्षणों को पहचानकर छात्रों को सही परामर्श केंद्र तक भेज सकें।
केतावा की संस्थापक का संदेश: “बिना किसी आलोचना के डर के मिले सहायता”
‘केटावा – सेंटर फॉर बिहेवियर चेंज’ की संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) डॉ. निधि जसवाल ने सर्वे के निष्कर्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस रिपोर्ट का मूल संदेश बिल्कुल साफ है—हमें जागरूकता को वास्तविक कार्रवाई में बदलना होगा।
डॉ. जसवाल ने कहा, “छात्रों को यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि संकट के समय उन्हें कहाँ जाना है। वे जब अपनी निजी समस्याओं पर बात करें तो उन्हें पूरी सुरक्षा महसूस होनी चाहिए। उन्हें ऐसी मदद मिलनी चाहिए जो 100% गोपनीय हो और जहाँ उनके चरित्र या आदतों का आकलन न किया जाए।” उन्होंने आगे कहा कि एक वास्तव में सहयोगी और मानसिक रूप से स्वस्थ कैंपस केवल वह नहीं है जहाँ एक काउंसलिंग रूम बना दिया जाए, बल्कि वह स्थान है जहाँ छात्र बिना किसी डर या शर्म महसूस किए मदद मांगने के लिए बेझिझक आगे आ सकें।
निष्कर्ष और भावी रणनीति
‘केतावा’ की यह रिपोर्ट शैक्षणिक जगत और नीति निर्धारकों के लिए एक आंखें खोलने वाली साबित हुई है। जैसे-जैसे आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में छात्रों पर पढ़ाई, करियर और व्यक्तिगत जीवन का दबाव बढ़ रहा है, वैसे-वैसे संस्थानों के भीतर मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना बेहद अनिवार्य हो गया है। आने वाले समय में उम्मीद है कि यह रिपोर्ट विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में व्यावहारिक बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाएगी।
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