सबरीमाला : सुप्रीम कोर्ट तय करेगी धार्मिक अधिकारों की नई सीमा

  • संवैधानिक नैतिकता बनाम परंपरा: पीठ यह तय करेगी कि क्या ‘नैतिकता’ शब्द में ‘संवैधानिक नैतिकता’ भी शामिल है और क्या यह धार्मिक अधिकारों से ऊपर है।
  • न्यायिक समीक्षा की सीमा: क्या कोई व्यक्ति जो उस विशेष धार्मिक संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, वह जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है?
  • अनिवार्य धार्मिक प्रथाएं: न्यायालय इस पर विचार करेगा कि किस सीमा तक अदालतें यह तय कर सकती हैं कि कोई प्रथा धर्म का ‘अभिन्न अंग’ है या नहीं।
  • व्यापक प्रभाव: इस सुनवाई का परिणाम भविष्य में भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच की लकीर को स्पष्ट करेगा।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली ,16 फरवरी :भारत के संवैधानिक इतिहास में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के टकराव पर एक नया अध्याय लिखे जाने को तैयार है। उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश संबंधी फैसले की समीक्षा और उससे जुड़े अन्य धर्मों के महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर सुनवाई का विस्तृत कार्यक्रम तय कर दिया है। 7 अप्रैल से शुरू होने वाली यह सुनवाई न केवल हिंदू परंपराओं, बल्कि मुस्लिम और पारसी समुदायों की धार्मिक प्रथाओं के भविष्य को भी निर्धारित करेगी।

सुनवाई का कार्यक्रम और मुख्य पक्ष

अदालत द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, समीक्षा का समर्थन करने वाले पक्ष 7 से 9 अप्रैल तक अपनी दलीलें पेश करेंगे। इसके बाद, फैसले का विरोध करने वाले पक्षों को 14 से 16 अप्रैल का समय दिया गया है। 21 अप्रैल को प्रत्युत्तर (rejoinder) प्रस्तुत किए जाएंगे और 22 अप्रैल तक सुनवाई पूरी होने की संभावना है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया है कि सरकार इस फैसले की समीक्षा का समर्थन कर रही है।

इतिहास और विवाद की जड़ें

यह पूरा मामला सितंबर 2018 के उस ऐतिहासिक 4:1 के बहुमत वाले फैसले से उपजा है, जिसमें तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। कोर्ट ने तब कहा था कि ‘भक्ति को लैंगिक भेदभाव का शिकार नहीं बनाया जा सकता’। हालांकि, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने तब असहमति जताते हुए कहा था कि धार्मिक प्रथाओं में न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं ने इस मुद्दे को एक व्यापक संवैधानिक बहस में बदल दिया।

सिर्फ सबरीमाला नहीं, दाऊदी बोहरा और पारसी महिलाओं का मुद्दा भी शामिल

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को केवल एक मंदिर तक सीमित न रखते हुए इसे एक ‘लार्जर बेंच’ (9 न्यायाधीश) को संदर्भित किया है। अब यह पीठ सात प्रमुख संवैधानिक बिंदुओं पर विचार करेगी, जिसमें अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच संतुलन बनाना शामिल है। इसमें मस्जिद/दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश, गैर-पारसी से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित ‘सामाजिक बहिष्कार’  जैसी प्रथाओं की वैधता की भी जांच होगी।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:

यह मामला अब कानूनी बारीकियों से ऊपर उठकर राष्ट्र की सामाजिक और धार्मिक चेतना का परीक्षण बन गया है। पूरा देश अब अप्रैल की उन तारीखों की प्रतीक्षा कर रहा है, जब देश की सबसे बड़ी अदालत इन पेचीदा सवालों के उत्तर तलाशेगी।

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