यूपी में 33 बच्चों से दुष्कर्म: पोक्सो कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, दंपति को फांसी

समग्र समाचार सेवा
उत्तर प्रदेश ,बांदा 21 फरवरी :उत्तर प्रदेश के बांदा से आई एक खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। 33 मासूम बच्चों के साथ यौन शोषण जैसे जघन्य अपराध में दोषी पाए गए एक दंपति को विशेष पोक्सो अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से ऐतिहासिक है, बल्कि समाज के सामने एक कड़ा आईना भी है।

विशेष पोक्सो न्यायाधीश की अदालत ने रामभवन और उनकी पत्नी दुर्गावती को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में रखते हुए मृत्युदंड दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अपराध की प्रकृति, उसका विस्तार और अमानवीयता ऐसी है कि इसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बचती।

पोक्सो एक्ट के तहत कई गंभीर धाराओं में दोषसिद्धि

दंपति को प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्सेज (POCSO) एक्ट के तहत कई गंभीर धाराओं में दोषी ठहराया गया। इनमें अप्राकृतिक यौन अपराध, गंभीर दुष्कर्म, बाल अश्लीलता और आपराधिक साजिश जैसी धाराएं शामिल हैं।

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि प्रत्येक पीड़ित को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। साथ ही, आरोपियों के घर से जब्त की गई किसी भी राशि को सभी पीड़ितों में समान रूप से बांटने का आदेश भी दिया गया है।

2010 से 2020 तक चलता रहा घिनौना खेल

जांच में सामने आया कि यह अपराध उत्तर प्रदेश के बांदा और चित्रकूट जिलों में वर्ष 2010 से 2020 के बीच लगातार चलता रहा। आरोपी रामभवन सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत था। उसने बच्चों को बहलाने-फुसलाने के लिए ऑनलाइन वीडियो गेम, पैसे और उपहारों का सहारा लिया।

कुछ बच्चे महज तीन साल के थे। जांच के दौरान सामने आया कि कई बच्चों को शारीरिक रूप से गंभीर चोटें आईं। कुछ को वर्षों तक अस्पताल में रहना पड़ा। कई पीड़ित आंखों की चोट और गहरे मानसिक आघात से अब भी जूझ रहे हैं।

सीबीआई की संवेदनशील जांच

अक्टूबर 2020 में Central Bureau of Investigation (सीबीआई) ने इस मामले में केस दर्ज किया। जांच एजेंसी ने मेडिकल जांच, काउंसलिंग और फोरेंसिक साक्ष्यों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया। डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखा गया और बाल संरक्षण प्राधिकरणों के साथ समन्वय बनाकर कार्य किया गया।

फरवरी 2021 में सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल किया। अदालत ने माना कि साक्ष्य इतने ठोस और व्यापक हैं कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देना ही न्याय के हित में है।

‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ क्यों?

अदालत ने कहा कि अपराध की व्यापकता, सुनियोजित तरीके और नैतिक पतन की पराकाष्ठा इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ बनाती है। यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के पतन की भयावह मिसाल है।

समाज के लिए चेतावनी

यह प्रश्न हर भारतीय के मन में उठ रहा है—क्या यह वही समाज है जिसे हम संस्कारों और धर्म की भूमि कहते हैं? क्या हमारी संवेदनाएं इतनी कुंद हो गई हैं कि मासूम बच्चों की चीखें भी हमें नहीं झकझोर पातीं?

भारतीय संस्कृति ने हमेशा धर्म को जीवन का मार्गदर्शक माना है। धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सही और गलत के बीच स्पष्ट भेद सिखाने वाला मूल्य तंत्र है। जब समाज दिशा खो देता है, जब नैतिक शिक्षा और पारिवारिक संस्कार कमजोर पड़ जाते हैं, तब ऐसे अपराध जन्म लेते हैं।

आज समय आ गया है कि हम आत्ममंथन करें। बच्चों की सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। परिवार, स्कूल, समाज और प्रशासन—सबको मिलकर एक सुरक्षित वातावरण तैयार करना होगा।

आगे का रास्ता

यह फैसला एक सख्त संदेश देता है कि बच्चों के खिलाफ अपराध किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे। लेकिन सजा के बाद भी असली चुनौती है—ऐसे अपराधों को होने से रोकना।

जरूरत है:

बच्चों को सुरक्षित और जागरूक बनाना

अभिभावकों को सतर्क करना

डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग पर निगरानी

नैतिक और मूल्य आधारित शिक्षा को मजबूत करना

अगर हम सच में एक सुरक्षित भारत चाहते हैं, तो हमें कानून के साथ-साथ अपने सामाजिक चरित्र को भी मजबूत करना होगा। धर्म का आश्रय केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सत्य, करुणा और मर्यादा का पालन है। वही समाज को सही दिशा दे सकता है।

यह फैसला न्याय की जीत है, लेकिन साथ ही एक चेतावनी भी—अगर हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।

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