आज के दौर में जहां विश्वविद्यालयों के प्रमुख महंगी गाड़ियों और आलीशान दफ्तरों में देखे जाते हैं, वहीं एक कुलपति ऐसे भी हैं जो सादगी और अनुशासन का उदाहरण बन गए हैं। हम बात कर रहे हैं कुलपति श्री बाजपेई जी की, जो अपनी अलग कार्यशैली के कारण शिक्षण जगत में एक नई मिसाल कायम कर रहे हैं।
कुलपति श्री बाजपेई जी हर दिन घर से विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय से घर साइकिल से आते-जाते हैं। न सर्दी की ठंडी हवाएँ उन्हें रोक पाती हैं, न गर्मी की तपती धूप और न ही बारिश की तेज़ फुहारें। उनकी यह सादगी केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश नहीं देती, बल्कि यह भी बताती है कि एक बड़े पद पर होते हुए भी व्यक्ति सरल जीवन जी सकता है।
शिक्षा संस्थानों में अनुशासन और प्रबंधन का विशेष महत्व होता है। कुलपति बाजपेई जी ने इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया है। उनकी कार्यशैली एक कॉर्पोरेट संस्कृति जैसी है, जहां सब कुछ सुचारू रूप से संचालित होता है।
प्रतिदिन सुबह 10 बजे वह विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों एवं अधिकारियों के साथ 15-20 मिनट की बैठक करते हैं। इस बैठक में विश्वविद्यालय के प्रशासन, शिक्षण कार्य, और अन्य आवश्यक विषयों पर चर्चा की जाती है। इसके बाद कुल-संगत (Assembly) में राष्ट्रगान गाया जाता है। यह प्रथा न केवल राष्ट्रीय भावना को सुदृढ़ करती है, बल्कि पूरे विश्वविद्यालय में अनुशासन और एकता की भावना को भी बढ़ावा देती है।
बाजपेई जी सिर्फ़ अनुशासनप्रिय ही नहीं, बल्कि शिक्षण पद्धतियों में नवाचार के भी पक्षधर हैं। उनकी कोशिश रहती है कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहे, बल्कि व्यावहारिक शिक्षा को भी महत्व मिले। उनकी इस कार्यशैली को देखकर कई अन्य शिक्षण संस्थान भी प्रेरणा ले सकते हैं।
कुलपति श्री बाजपेई जी का यह समर्पण और कार्यशैली उन्हें केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि एक महान नेतृत्वकर्ता बनाती है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालय का माहौल तभी सकारात्मक रहेगा, जब शिक्षक और प्रशासन खुद अनुशासन का पालन करेंगे और एक आदर्श स्थापित करेंगे।
आज जब शिक्षा जगत में प्रशासनिक विलासिता का बोलबाला है, ऐसे में श्री बाजपेई जी जैसे कुलपति शिक्षा के मूल्यों को पुनः जीवंत कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय केवल ज्ञान का केंद्र ही नहीं, बल्कि अनुशासन, सादगी और नैतिकता का भी उदाहरण बन रहा है।
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