समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 28 अगस्त: भारत में उपराष्ट्रपति पद का चुनाव इस बार केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि संवैधानिक और वैचारिक संघर्ष का मैदान बन गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के उम्मीदवारों के बीच हो रही यह लड़ाई न्यायपालिका, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहरे सवाल खड़े कर रही है।
शाह का विपक्षी उम्मीदवार पर वार
22 अगस्त को मनोरमा समूह की सभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष के उम्मीदवार जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी पर तीखा हमला बोला। शाह ने कहा कि रेड्डी वही व्यक्ति हैं जिन्होंने सलवा जुडूम पर ऐसा निर्णय दिया, जिसने नक्सलवाद को खत्म होने से रोक दिया। शाह का आरोप था, “अगर यह जजमेंट न होता तो वामपंथी नक्सलवाद 2020 तक मिट चुका होता।”
हालांकि, जस्टिस रेड्डी का कहना है कि वह निर्णय उनका व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश था, जो संविधान की व्याख्या पर आधारित था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ (जस्टिस रेड्डी और जस्टिस एसएस निज्जर) ने कहा था कि राज्य नागरिकों को हथियार नहीं सौंप सकता।
सलवा जुडूम का सच
छत्तीसगढ़ में शुरू किए गए सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान 650 से ज्यादा गांव जला दिए गए थे, 50 हज़ार से अधिक लोगों को कैंपों में रखा गया और 1.5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि लोकतांत्रिक राज्य का कर्तव्य नागरिकों को लड़ाई में झोंकना नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा करना है। यही फैसला सत्ता पक्ष को खटक रहा है।
उम्मीदवारों का प्रोफाइल
सत्ता पक्ष के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन – आरएसएस से जुड़े राधाकृष्णन 17 साल की उम्र में ही जनसंघ की राज्य कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने। दो बार लोकसभा सांसद रहे और झारखंड, तेलंगाना, पुदुचेरी और महाराष्ट्र के राज्यपाल पदों पर रह चुके हैं।
विपक्ष के उम्मीदवार जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी – 1971 में उस्मानिया विश्वविद्यालय से विधि स्नातक, 1995 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और 2007 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने। 2011 में सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक सिद्धांतों पर जोर दिया।
संविधान बनाम विचारधारा
सत्ता पक्ष की राजनीति लंबे समय से आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित रही है। संघ का संविधान और तिरंगे को लेकर पुराना दृष्टिकोण किसी से छिपा नहीं है। वहीं विपक्ष ने उपराष्ट्रपति पद के लिए ऐसे उम्मीदवार को खड़ा किया है, जिनकी पूरी पहचान संविधान और न्यायपालिका से जुड़ी है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि अमित शाह का हमला केवल व्यक्तिगत आलोचना नहीं, बल्कि उस संवैधानिक व्यवस्था पर प्रश्न है, जो लोकतंत्र में संतुलन बनाए रखती है।
लोकतंत्र के लिए चुनौती
आज सवाल यह है कि उपराष्ट्रपति जैसे महत्वपूर्ण पद को कौन सुशोभित करेगा –
- आरएसएस की राजनीतिक पृष्ठभूमि से आए सी.पी. राधाकृष्णन?
- या संविधान और न्यायपालिका से गहराई से जुड़े जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी?
देश ऐसे दौर से गुजर रहा है जब संविधान पर बार-बार सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का सवाल भी है।
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