वोटर लिस्ट संशोधन पर संसद में बवाल, कंगना बोलीं—विपक्ष लोकतंत्र का गला घोंट रहा है

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 30 जुलाई: बिहार में चल रही विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, विपक्ष इस प्रक्रिया को लेकर सरकार पर हमलावर होता जा रहा है। संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे को लेकर हंगामा हुआ, तो वहीं भाजपा सांसद कंगना रनौत ने विपक्ष की आलोचना करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी।

कंगना रनौत ने कहा कि यह प्रक्रिया बिल्कुल वैध और लोकतांत्रिक है। उन्होंने कहा कि “SIR हर सरकार में होता आया है, कांग्रेस के समय में भी यह बीसियों बार हुआ है। वर्षों से ये प्रक्रिया नहीं हुई थी, हमें तो इसकी मांग करनी चाहिए थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि कौन इस देश का नागरिक है और कौन घुसपैठिया। कौन वोट देने के योग्य है और कौन नहीं।”

उन्होंने कहा कि “अगर सरकार एक संवैधानिक प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से लागू कर रही है, तो विपक्ष को उससे परेशानी क्यों हो रही है?” कंगना का यह बयान विपक्ष के आरोपों के ठीक बाद आया है जिसमें दावा किया गया था कि सरकार कुछ खास वर्गों को निशाना बनाकर वोटर लिस्ट से नाम काट रही है।

SIR पर कंगना का विपक्ष को जवाब

कंगना रनौत ने पहले भी विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा था कि विपक्ष को लोकतंत्र और देश की परवाह नहीं है, उन्हें सिर्फ राजनीतिक हंगामा करना आता है। उन्होंने आरोप लगाया कि “ये लोग हर दिन सदन की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं, संविधान का गला घोंट रहे हैं और लोकतंत्र का मज़ाक बना रहे हैं।”

65 लाख नाम हटाए गए

इस पूरी प्रक्रिया के पहले चरण में करीब 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इनमें मृत, विस्थापित और दो जगह पंजीकृत नाम शामिल हैं। अब राज्य में कुल 7.24 करोड़ मतदाता सूचीबद्ध हैं। यह बदलाव एक बड़े जनसंख्या सत्यापन और निर्वाचन सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

हालांकि, विपक्ष का दावा है कि इन नामों को हटाने के पीछे राजनीतिक मंशा है। उनका आरोप है कि सरकार जानबूझकर कुछ सामाजिक और धार्मिक वर्गों के नाम सूची से हटा रही है, जिससे वोट बैंक को प्रभावित किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट की नजर में SIR

इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि अगर यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर वोटरों को गलत तरीके से हटाने का मामला बनती है, तो अदालत इसमें हस्तक्षेप कर सकती है। यह चेतावनी बताती है कि अब न्यायपालिका भी इस संवेदनशील मामले पर गंभीरता से निगरानी कर रही है।

राजनीति या पारदर्शिता का संघर्ष?

विपक्ष जहां इसे लोकतांत्रिक संकट बता रहा है, वहीं भाजपा इसे पारदर्शिता और लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी कदम मान रही है। कंगना रनौत जैसी नई सांसदों की ओर से आए तीखे बयान इस बहस को और गर्माते जा रहे हैं।

बिहार की SIR प्रक्रिया सिर्फ एक तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक भागीदारी और विश्वास का मामला बन चुकी है। अगर यह प्रक्रिया निष्पक्षता से की जाती है तो यह लोकतंत्र को मजबूती देगी। लेकिन यदि इसमें पक्षपात या गलत नीयत सामने आती है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों को ठेस पहुंचा सकती है।

कंगना रनौत की टिप्पणियां इस बहस को एक नई धार दे रही हैं। जहां एक ओर यह प्रशासनिक सुधार का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर, यह सियासी आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र भी बन चुका है। अब देखना यह है कि SIR का अगला चरण क्या सच्चे लोकतंत्र की ओर बढ़ता कदम साबित होता है या सियासी तूफान का एक और बहाना।

 

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