माही अग्रवाल
जैसे यदि बात करूँ तो कुछ बातें इस तरह से कही जाती हैं जैसे अवधारणा के स्तर पर कोई बहुत बड़ी या भारी भरकम बात हो।
उदहारण के लिए लूँ तो- जैसे, मैं कौन हूँ “आप कौन हैं?” “हर क्षण हमें वर्तमान में जीना चाहिए!” “खुद में भरोसा रखो! (सेल्फ कांफिडेंस),” “मन का शून्य हो जाना” या कोई इसे अमन होना कह देता है तो कोई और जोर देकर जितेन्द्रिय टाइप कुछ।
जितेन्द्रिय अर्थात जिसने अपने सभी इन्द्रियों पर विजय पा ली है! हालाँकि, पा के क्या किया इस पर बात नहीं होती और यही सबसे बड़ी विडम्बना भी आपको बहुत से जगहों या व्यक्तियों में दिखेगी कि जहाँ से दरअसल बात शुरू होनी चाहिए उससे पहले ही उनकी बात समाप्त हो चुकी होती है और यही वजह है कि ऐसे लोग बस पाले पर ही रह जाते हैं।
चलिए, सबसे पहले बात वर्तमान से शुरू करती हूँ। इस पर बात बिना समय पर बात किए हो नहीं सकती तो थोड़ी देर के लिए विचार कीजिए कि समय क्या है?
वैसे यह कोई नया प्रश्न नहीं है। कोई नया प्रश्न संभवतः अब बचा भी नहीं है! उसकी एक बड़ी वजह यह है कि अब तक कि यात्रा में जो भी पहले आए जिन्होंने खुद को बोध के स्तर पर उठाना चाहा वह बिना ऐसे सवालों से पार गए संभव न हुआ।
चूँकि, सभी लोग अचानक से टपके हुए लोग नहीं हैं बल्कि एक बहुत लम्बी परंपरा की मात्र एक कड़ी हैं तो पीछे के उस ज्ञान परंपरा से भी पूरी तरह अलग नहीं हैं! हाँ, कट जरुर गए हैं! उसकी एक वजह यह है कि आप गैरजरूरी सूचनाओं से इतनें घिरे हैं कि “जो जैसा है उसे वैसे ही न देख पाते हैं न समझ पातें हैं! कुछ लोग अपवाद भले हो सकते हैं!
इस लहजे में कह रही हूँ क्योंकि भाषा की अपनी सीमा है! किसी एक सत्य को बांधने में कई छूट जाते हैं और इसी अधूरेपन से बचने के लिए मौन चुनकर सभी बोध को प्राप्त हुए ज्ञानियों ने, खोजी को खुद ही गूंगे का गुड़ हो जाने अर्थात स्वयं अनुभव करने को प्रोत्साहित किया! जिसे बुद्ध ने “अप्प दीपो भव!” कहा।
आज के दौर की बात की जाए तो यहाँ सभी बहुत सारी नाहक सूचनाओं से भरे हैं। हालाँकि, ऐसी स्थिति के लिए गलती किसी एक की या आपकी ही नहीं हैं। धीरे-धीरे विकास यात्रा में जब सूचनाएँ (मूल ज्ञान) मौजूद थी उन्हें आगे बढ़ाने के लिए एक डस्टबिन टाइप कुछ चाहिए था जिसमें भरकर संग्रहित ज्ञान आगे बढ़ाया जाए।
तो चूँकि, उस समय इंसान की स्मृति के अलावा कोई टूल नहीं था तो उसे साधन बनाकर बात आगे बढ़ाई गई! पर स्मृतियाँ ट्रेसेस पर काम करती हैं, कितनी भी गहरी ट्रेसेस क्यों न हो उसे एक दिन क्षीण या ख़त्म हो ही जाना है! और यही वह बड़ी वजह रही कि आज उस प्राचीन-ज्ञान विज्ञान और तकनीकी परंपरा का कुछ भी अपने मूल रूप में नहीं है।
कहीं कोई प्राचीन स्ट्रक्चर या उर्जा का प्रबल क्षेत्र है भी तो लोग अपनी समझ का वो तेज खो चुकें हैं जो उस बोध तक पहुँचने के लिए जरुरी शर्त थी।
कालांतर में जब तकनीक का विकास हुआ तो वह सभी ज्ञान संग्रहित करने की कोशिश हुई! लेकिन मूल रूप में आज कुछ भी सुरक्षित नहीं है वह बहुत हद तक विकृत हो चुकी है….. इसलिए ज़्यादातर अपने उस मूल रूप में कार्य करती हुई नजर नहीं आती है, जैसा कभी करती रही होगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बाहर जो ज्ञान परंपरा दस्तावेजों के रूप में थी सिर्फ वही विकृत हुई बल्कि बल्कि धीरे-धीरे सूचनाओं के बाढ़ के कारण हमारे इस शरीर तंत्र का ही बहुत कुछ इस तरह से प्रभावित हो गया है कि लोग खुद एक बड़े ‘डस्टबिन’ हो चुके हैं।
यह सारी सूचनाएँ आधे-अधूरे रूप में स्मृतियों में सुरक्षित हैं। स्मृति, बुद्धि अर्थात दिमाग का एक जरुरी हिस्सा है! यदि किसी भी बात की कोई भी अवधारणा आपके स्मृति भंडार में न हो तो आप उसे जान ही नहीं पाएँगे।
उदाहरण के लिए- यदि छोटे बच्चे के अन्दर यह सूचना आप न भरें कि साँप खतरनाक होता है, काट लेगा तो मर जाओगे आदि तो उस बच्चे के लिए साँप का कोई मतलब नहीं होगा, वह साँप के पास ही मस्ती से रहेगा और आप अपनी जानकारी के कारण पसीने-पसीने।
आज आपके स्मृति भंडार में क्या-क्या आधे-अधूरे रूप में है ये किसी को न भी बताएँ तो भी कम से कम आपको तो पता है ही।
अब यहीं से सारा खेल शुरू होता है, मस्तिष्क और मन का! और दोनों कहीं न कहीं स्मृतियों का ही खेल है, दोनों आपस में एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं, जैसे आपको मस्तिष्क या बुद्धि का केंद्र पता है और मन का आपके शरीर में कोई एक केंद्र नहीं है लेकिन यह भी स्मृतियों का ही खेल है लेकिन ज़्यादा सर्वव्यापी।
इसे उदहारण से समझाती हूँ, जैसे कोई बच्चा जब पैदा होता है तो उसका मस्तिष्क अपने नवजात स्टेज में होता है उसमें किसी भी तरह की कंक्रीट स्मृति नहीं होती लेकिन मन समृद्ध होता है। मन वह बेसिक जरुरत है जो उसके सर्वाइवल के लिए जरुरी है।
वह मन ही है जो भूख लगने पर उससे अलग तरह का क्रंदन और पेट भर जाने पर निश्छल मुस्कान, मामला ओवरलोडिंग का आ जाए तो वही बच्चा मन से ही मस्तिष्क को नियंत्रित कर जो अतिरिक्त है उसे पलट भी देता है। एकदम त्वरित और स्मूथ प्रक्रिया जिसे आज आप चाहकर भी सहजता से नहीं कर सकते!
आप बाकी कहानी जानते हैं कि कैसे कोई बच्चा माँ के गर्भ में आकार लेता है और पोषण पाता है लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सेल ट्रांसफर हुआ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में उस कड़ी में ही लाखों सालों की स्मृतियाँ हैं! (जो मन का आधार हैं।).
और दूसरी बात जो सेल ट्रान्सफर हुई थी वह जीवित सेल थी और हर उस सेल के छोटे से छोटे हिस्से में भी विकास की पूरी कहानी। जिससे आगे जाकर एक जीवन निर्मित होगा और उसका पालन भी।
यहीं उस बिंदु पर बात ले जाना चाहती हूँ जो आप सभी के विश्वासों से जुड़ा है और कदाचित आत्मा-अनात्मा की बहस से भी… जो भी दोनों खेमों में बंटे है वो अपने विश्वास के कारण ही उलझे हैं! (इस बहस पर अलग से फिर कभी आउंगी)
बच्चे (भ्रूण) के सेल की हर कड़ी को उसका अपना मूल काम विरासत में मिली है, जिसमें किसी भी तरह की चूक की गुंजाईश नहीं है यदि वह पूर्णतः प्राकृतिक रूप में घटित हो! जहाँ भी व्यतिक्रम दिखेगा उसकी वजह कोई म्युटेशन अर्थात बाहरी हस्तक्षेप के बाद उस मूल परंपरा में आया व्यवधान है!
यह आतंरिक ज्ञान ट्रान्सफर होने की प्रक्रिया है जो जीवित सेल से जीवन की विकास की यात्रा के रूप में है।
यह सेल की अपनी मूल स्मृति ही है कि आप आगे जीवन बनाए रखने के लिए भी जीवन पर ही निर्भर रहेंगे।
जैसे आप जो कुछ भी ग्रहण करेंगे जिससे यह जीवन आगे बढ़े, उसे हर हाल में जीवन ही होना चाहिए, फिर चाहे वो किसी भी फॉर्म में क्यों न हो!
यहीं से एक कड़ी निकलकर शाकाहार और मांसाहार के डिबेट को भी बढ़ावा देगी जो विश्वास और ब्रेनवाश दोनों पर आधारित है। (इस पर भी बात कभी अलग से…)
अभी तक जो भी लिख चूँकि हूँ उसमें कई मोड़ है। हर मोड़ पर एक नया विवाद, विश्वास और अवधारणा हैं।
सबको इस लेख में समेटूं तो बहुत बड़ी हो जाएगी। फिर भी कुछ बिन्दुओं पर संक्षेप में बात करती चलती हूँ।
जैसे जीवन ही जीवन का आधार है: तो जो जीवन कोशिकाओं के रूप में दो जीवित सेल (माता-पिता) से आगे बढ़ी है वह जीवित माता के गर्भ में उनके जीवन के हिस्से से ही जीवित रूप में विकसित हो रही है।
आगे भी उसके विकास के लिए जीवन ही चाहिए चाहे वो किसी भी रूप में हो उसका जीवित होना अनिवार्य है। कोई भी, कुछ भी ऐसा खाकर जीवित नहीं रह सकता; जिसमें जीवन न हो।
यदि आप खाना बंद कर देंगे तो भी आप जीतना तीव्र आपके अन्दर जीवन है उसी अनुपात में जीवित रहेंगे क्योंकि बाहरी भोजन के अभाव में आपको जीवित रखने के लिए पूर्व प्रोग्राम्ड सेल, अपने ही पड़ोसी कमजोर सेल को खाने लगती हैं।
इसका उदाहरण लूँ तो- आपको जैन धर्म में संलेखना के रूप में दिखेगा जिसे धार्मिक प्रक्रिया से जोड़ दिया गया है इसलिए उस पर टिप्पणी न करके इशारा करते हुए आगे बढ़ रही हूँ! व्रत, उपवास, रोजा आदि में भी शरीर तंत्र खुद को इसी प्रक्रिया के तहत जीवित रखती है वो खुद का ही भक्षण करने लगती है! जिसका आभास जो भी उस स्टेज में हैं उसे एनर्जी लॉस के रूप में महसूस होता है लेकिन अपने विश्वास की वजह से लोग नजरंदाज करते हैं।
अब मस्तिष्क, मन की जुगलबन्दी पर बात कर लेती हूँ। दोनों अलग हैं यह बात भी स्पष्ट हो जाएगी और एक दूसरे के सहायक भी हैं यह भी।
जैसे ज़्यादातर लोग अपने मन का करना चाहते हैं या मन के अनुसार ही रहना चाहते हैं। यह इसलिए क्योंकि मन हावी है मस्तिष्क पर, इसे आप उदाहरण से समझिए- जैसे सबको यह सूचना है कि फला अपराध करेंगे तो यह सजा, दूसरे में दूसरा लेकिन ऐसी जानकारी रखने वाला व्यक्ति इस सूचना के बाद भी अपराध करता है और सरकारें कानून पर कानून बनाती है लेकिन ऐसे अपराधियों के मन के कंडीशनिंग को तोड़ने पर काम नहीं करती और जो ऐसा कर सकते हैं उन्हें मौका नहीं दिया जाता।
एक और बात यहीं जोड़ दूँ कि घर में कितना भी डर दिखाया गया हो बड़ों द्वारा लेकिन सिर्फ मन के मस्तिष्क पर हावी होने के कारण सबने बहुत से ऐसे काम किए हैं जो सामाजिक रूप से या हो सकता है कानूनी भी, गलत हो! फिर भी आपने किया न, उसे याद कीजिए और मुस्कराइए कि पकड़े नहीं गए नहीं तो ‘छिपे हुए छोटे अपराधी’ आप भी निकल सकते थे!
मन क्यों हावी है मस्तिष्क पर उसकी सबसे बड़ी वजह भी यही है कि आपका मन आपके शरीर तंत्र के हर सेल में व्याप्त है, दूसरी बात मन की जो यात्रा है वह जीवित सेल के माध्यम से है…… और इस बहाव में सभी अरबों वर्षों की यात्रा में एक कड़ी हैं।
यह हर सेल की अपनी प्रकृति है, ठीक बीज की तरह की मिटती और निर्मित होती रहती है, उस अनुपात में जब तक शरीर का उर्जा तंत्र उसे माकूल माहौल उपलब्ध कराता है।
जैसे ही इस आयोजना में कमी आने लगती है शरीर में कोशिकाओं का निर्माण बंद हो जाता है और नए सेल नहीं बनने से वह शरीर धीरे-धीरे अपनी स्वाभाविक मृत्यु की तरफ बढ़ने लगती है और एक दिन जब इस शरीर की उर्जा इतनी क्षीण हो जाती है कि इस तंत्र को संभाल पाने में विफल हो जाए उसी दिन इस शरीर की स्वाभाविक मृत्यु होती है। (जीवन मृत्यु पर उर्जा को केंद्र में रखकर पिछले पोस्टों में लिखी हूँ!)
फिर यह शरीर प्रकृति की चक्रीय नियमों के अनुसार पुनः अपने मूल तत्वों में विघटित हो जाएगी- धर्म/मजहब/पंथ के आधार पर तरीका कोई भी हो पर विघटन होना तय है! और उसी के अनुसार समय कम ज़्यादा लग सकती है।
चूँकि, मन की व्याप्ति पूरे शरीर में है और उसकी यात्रा कभी पुरानी न हो इसलिए प्राकृतिक रूप से मन के पास वास्तविकता और कल्पना में अंतर करने का कोई टूल नहीं है……(यानी वह भूत-भविष्य-वर्तमान से परे है!) इसका अनुभव करने के लिए आपको पहले वर्तमान समझा देती हूँ।
अब आपसे पूछती हूँ क्या वर्तमान के सिवा आप कहीं हो सकते हैं? नहीं हो सकते हैं- भूत-भविष्य और वर्तमान में समय को इसलिए बांटा गया था कि आप समय की गतिशीलता को जान पाएँ अगर सिर्फ एक ही शब्द वर्तमान ही होता तो कभी भी आपको समय का प्रवाह नहीं समझाई जा सकती थी।
चूँकि, समय को और गूढ़ तरीके से समझने के लिए टाइम और स्पेस को भी समझना होगा, उस पर किसी और दिन चर्चा करुँगी।
फिलहाल, इस भ्रम से निकलिए कि आपको वर्तमान में जीना है! आप सदैव वर्तमान में ही है और अभी आपका समय घड़ी, मौसम, दिन-रात के सापेक्ष है! इसलिए यह भ्रम भी रहता है कि जो बीत गया दिन वह भूत काल है, जो आएगा दिन वह भविष्य काल और आज का पूरा दिन वर्तमान है!
और अगर सुबह आपने अपने आप को याद दिलाया है एक बार फिर कि आज से वर्तमान में जिएँगे तो अब आप घड़ी का सहारा ले बच निकलना चाहेंगे कि अभी सुबह के 10 बज रहे हैं बहुत जल्द ही 4 बजे से वर्तमान में जियूँगा तो आप जी चुके और मिल लिए वर्तमान से वह हाथ नहीं आने वाला।
दरअसल, भूत-वर्तमान-भविष्य तीनों आपस में जुड़े हैं और हर क्षण में समाहित हैं, सब कुछ क्षणिक है यूँ ही नहीं कहा गया है….. उसके पीछे बहुत बड़ी ज्ञान की परंपरा है।
एक और बात ध्यान दीजिए आपको एहसास भी नहीं है कि हर क्षण के साथ आपके सामने से आपका भूत-वर्तमान-भविष्य गुजर रहा है और आप बाहरी अवधारणाओं से सीखी हुई अपने स्मृतियों के अतीत और काल्पनिक भविष्य में खोए हुए हैं और यही वह सबसे बड़ी वजह है कि अधिकांश के मन का कभी नहीं होता।
और चूँकि मन का नहीं होता इसलिए वे सदैव दुखी रहते है…… और काल्पनिक भविष्य का सहारा ले काल्पनिक सुख खोजते रहते हैं जो उसी रूप में नहीं आने वाला…. क्योंकि कल्पना में ही है! अब जिसकी नींव ही खोखली हो भला उस पर बुलंद ईमारत की आप सोच भी कैसे सकते हैं।
एक और बात जो ऊपर अधूरी रह गई थी, आपको मन के सम्बन्ध में बता दूँ- मन, मस्तिष्क से प्रभावित है और कल्पना-वास्तविकता का अंतर नहीं कर सकता।
इसे एक छोटे से उदहारण से आपको अनुभव कराती हूँ– जैसे किसी व्यक्ति के पास खाने के किसी आइटम की कोई जानकारी नहीं है, उसे कोई आइटम पहली बार खिलाइए, देखिएगा अगले ही पल से यह सूचना पूरे मन तंत्र में फ़ैल जाएगी और आपका मन अगले दिन वही डिमांड करने लगेगा नाम और पूरी सूचना के साथ.. यह कैसे संभव हुआ तो समझिए कि आपका मस्तिष्क भी सेल्स की बुनियाद से ही बना है और मन पूरे सेल में व्याप्त।
वास्तविकता और कल्पना आपके अनुभव में है! बस मुझे याद दिलाने की जरुरत भर है! अब जरा याद कीजिए—- आप अपनी स्मृतियों का सहारा ले, वहीं संग्रहित अतीत से जब कुछ भाव उठा लाते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया में ही आपका पूरा शरीर तंत्र कभी मुस्कराता तो कभी आंशु बहाता है।
वह घटना तो अभी नहीं घटी या तो वह आपकी स्मृति भंडार में है या आने वाली भविष्य की कल्पनाओं में; यह आप भी जानते हैं लेकिन चूँकि मन के पास इसका अंतर करने की क्षमता नहीं है और आपके शरीर तंत्र में सभी भाव मन की ही सहचरी हैं और उनका कण्ट्रोल मस्तिष्क की कोशिकाओं के पास तो मन के निर्देश से मस्तिष्क की ओर से आदेश सम्बंधित अंग तंत्र को भेज दिया जाता है और वैसी ही प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है- अब चाहे काम, क्रोध, हँसी, ख़ुशी, दुःख-सुख किसी भी रूप में क्यों न हो।
आपस में जुड़े हैं इसका अगर कोई और प्रमाण दूँ तो याद कीजिए जिसके लैक्टिक ग्लैंड में गड़बड़ी आ जाए तो मातृत्व जाग जाने पर भी स्तनों से दूध नहीं उतरता और यदि अश्रुग्रंधी में गड़बड़ी हो जाए तो आंशु बहने बंद हो जाते हैं और इन ग्रन्थियों का केंद्र मस्तिक के अलग-अलग सेंटर्स में ही है!
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