शिवानन्द
मोदी जी का यह कैसा संकल्प है ! अगले पाँच वर्षों तक अस्सी करोड़ लोगों को मुफ़्त राशन मिलता रहेगा. इसको किस आधार पर संकल्प कहा जाएगा ! संकल्प तो यह हो सकता है कि हमारी सरकार अगले पाँच वर्षों में दस करोड़ या बीस करोड़ लोगों को इस लायक़ बना देगी कि वे मुफ़्त राशन पर निर्भर नहीं रहेंगे.
मोदी जी के पिछले दस साल के शासन काल में देश में क्या स्थिति है! स्वास्थ्य के क्षेत्र की हालत ख़राब है. पिछले पाँच वर्षों में अस्पताल में भर्ती होने के बाद खर्च में दोगुना वृद्धि हुई है. दवाइयों की क़ीमतों में हर वर्ष वृद्धि हो रही है. इलाज गरीब आदमी की पहुँच के बाहर होता जा रहा है. संकल्प तो यह कहा जाएगा कि अगले एक या दो साल में दवाइयों की क़ीमत आधी या चौथाई कम कर देंगे.
शिक्षा के क्षेत्र में भी यही हाल है. 2019 के अपने चुनाव घोषणा पत्र में मोदी जी ने वादा किया था कि उनकी सरकार शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च करेगी. लेकिन खर्च हुआ मात्र 2.7 प्रतिशत. शिक्षा पर खर्च के मामले में दुनिया के देशों में हमारा देश 136 वे स्थान पर है.
देश के अंदर बेरोज़गारी और महंगाई अपने चरम पर है. 2014 में युवाओं को मोदी जी ने सपना दिखाया था कि हमारी सरकार बनेगी तो हम प्रति वर्ष दो करोड़ नौकरी देंगे. आज देश में बेरोज़गारी का प्रतिशत चिंताजनक है. देश की अंदरूनी हालत भी आश्वस्त करने वाली नहीं. मोदी जी मणिपुर को सँभाल नहीं पा रहे हैं. उधर लेह, लदाख और कारगिल का इलाक़ा उबल रहा है. इसी इलाक़े में चीन हमारे हज़ारों वर्ग मील ज़मीन पर क़ब्ज़ा जमाए बैठा है.
राजनाथ जी का दावा है कि भारत जब विश्व के मंच पर बोलता है तो दुनिया सुनती है. लेकिन हक़ीक़त क्या है ! बग़ल में पाँच लाख की आबादी वाला देश मालदीव हमारा घोर विरोधी हो चुका है. वहाँ की अब तक की परंपरा रही है कि चुनाव जीतने वाला राष्ट्रपति अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत भारत से करता है. अबकी बार यह परंपरा टूट गई. नव निर्वाचित राष्ट्रपति ने अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत चीन से की है. भूटान भी बेचैन है. हालाँकि अभी प्रधानमंत्री जी वहाँ गए थे. पूर्व में भारत भूटान को प्रति वर्ष पाँच हज़ार करोड़ रुपये की सहायता देता था. अपनी ताज़ा यात्रा में प्रधानमंत्री जी ने सहायता राशि दोगुनी यानी दस हज़ार करोड़ कर हालत को सुधारने का प्रयास किया है.
पिछले दस वर्षों के मोदी शासन काल में देश में लोकतंत्र की क्या हालत है ! वैसे तो हमारे देश की शासन व्यवस्था के तीन पाए हैं. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. तीन पायों में न्यायपालिका पर सरकार का गंभीर दबाव है. जबकि न्यायपालिका को हमारे संविधान का गार्जियन माना जाता है. हमारे संवैधानिक अधिकारों की रक्षक न्यायपालिका ही है. अभी उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के भूपू न्यायाधीशों का सार्वजनिक बयान आया है. उन्होंने न्यायपालिका पर सरकार के बढ़ते दबाव और दबावों के चलते प्रभावित होते निर्णयों को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता प्रकट की है.
मोदी जी ने लोकतंत्र को ही लंगड़ा बना दिया है. लोकतंत्र के चौथे पाये को इन्होंने लगभग अपने क़ब्ज़ा में कर लिया है. वह चौथा पाया है मीडिया. अख़बार और टेलीविजनों के समाचार चैनल . जहाँ मीडिया स्वतंत्र नहीं है वहाँ लोकतंत्र को स्वस्थ और चैतन्य नहीं माना जाता है. यही वह माध्यम है जिसके ज़रिए जनता का सुख दुख सरकार तक पहुँचता है. या सरकारों की बात जनता तक पहुँचती है. इधर टेलीविजन एक मज़बूत माध्यम बन गया है. अख़बार तो हर जगह नहीं पहुँचते हैं. लेकिन टेलीविजन की पहुँच तो प्रायः झोपड़ियों तक हो चुकी है. टेलीविजन पर दिन रात मोदी जी दिखाई और सुनाई देते हैं. एक से एक पोशाक, तरह तरह की रंगीन पगड़ी में !मोदी जी आत्ममुग्ध व्यक्ति हैं. लंबा लंबा प्रवचनी अंदाज़ में भाषण करते हैं. यह एक प्रकार का रोग है. इसके शिकार व्यक्ति को अपना ही चेहरा, अपनी ही बोली अच्छी लगती है. बीच में अगर कोई टोक दे या सवाल पूछ दे तो वह लड़खड़ाने लगता है.
अपनी इसी कमजोरी की वजह से पिछले दस वर्षों में मोदी जी ने प्रेस वालों से एक मर्तबा भी बात नहीं की है. क्योंकि महंगाई, बेरोज़गारी या ग़रीबी के सवालों का उनके पास जवाब नहीं है. लेकिन इन समस्याओं से आम आदमी परेशान है. मोदी जी की पगड़ी से या उनके भाषणों से न महंगाई दूर हो रही है न बेरोज़गारी. इसलिए इस चुनाव में चार सौ नहीं मोदी जी के लिए दो सौ पार करना मुश्किल होगा.
मोदी जी के राम राज में ग़रीबों की खैर नहीं है.
भगवान राम तो वचन के पक्के थे. लेकिन उनके परम भक्त होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी जी वचनभंगी हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के समय देश को उन्होंने जो वचन दिया था वह सबकी स्मृति में है. विशेष रूप से प्रति वर्ष दो करोड़ युवाओं को काम देने, किसानों की आमदनी को दोगुना करने, 2022 तक हर गरीब के घर की छत पक्का होने जैसे वादे किए गए थे। क्या इनमें कोई एक भी वचन मोदी जी पूरा कर पाए ?
अब उनकी गारंटी युवा कैसे भूल जाएँ. उस गारंटी पर यक़ीन कर मोदी जी की सभाओं में नौजवान उन्मादी की तरह ‘मोदी मोदी ‘ का नारा लगाया करते थे. उस गारंटी का क्या हुआ ?

मोदी जी के शासनकाल में बेरोज़गारी और बढ़ी है. बेरोज़गारी बढ़ने का अर्थ है ग़रीबी का बढ़ना. चौंकाने वाली बात यह है कि जिस अनुपात में ग़रीबी बढ़ी है उसी या उससे ज़्यादा अनुपात में देश में अरबपतियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. 2023 में देश में 1,319 अरबपति हैं. यानी इतने लोगों के पास 1,000 करोड़ रुपये या उससे ज़्यादा की संपत्ति है. एक साल में अरबपतियों में 216 नये अरबपति जुड़े हैं. पिछले पाँच साल में इस संख्या में 76 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
जिस अनुपात में अरबपतियों की संख्या बढ़ी है उसी अनुपात में ग़रीबी बढ़ी है. देश में चिंताजनक रूप में ग़ैर बराबरी बढ़ी है. इतनी गैरबराबरी अंग्रेज़ों के राज में भी नहीं थी.
हमारे प्रधानमंत्री जी पूजा पाठ वाले देश में भगवान राम के नाम पर लोगों को अपने चुनावी जाल में फँसाते हैं. रामजी को तुलसीदास ने गरीबनवाज कहा था पर मोदी जी के राम राज में गरीबों की खैर नहीं। इस फ़रेब को राम जी समझ गये हैं. इसलिए अबकी बार दो सौ पार करना मोदी जी के लिए मुमकिन नहीं है.शिवानन्द
आजादी के दौरान
गाँधी जी 25 जुलाई 1947 को अपनी प्रार्थना सभा में.बोल रहे थे. 15 अगस्त 1947 के देश आज़ाद हुआ था. उसके एक महीना पहले. देश का विभाजन तय हो चुका था. सांप्रदायिकता की आग लगी हुई थी. उस पृष्ठभूमि में यह गाँधी ही थे जो बग़ैर लाग लपेट के ऐसी बात कह सकते थे.:-
आज राजेन्द्र बाबू ने मुझ को बताया कि उनके पास क़रीब 50 हज़ार पोस्टकार्ड,पच्चीस तीस हज़ारपत्र और कई हज़ार तार आए हैं जिनमें गो हत्या बा क़ानून भंग करने के लिए कहा गया है. इस बारे में मैंने आपसे पहले भी कहा था. आख़िर इतने ख़त और तार क्यों आते हैं ?इनका कोई असर तो हुआ नहीं. एक कार और आया है जिसमें बताया गया है कि एक भाई ने तो इसके लिए फाका भी शुरू कर दिया है. हिंदुस्तान में गो हत्या रोकने का कोई क़ानून वन नहीं सकता. हिंदुओं को गाय का वध करने की मनाही है,इसमें मुझे शक नहीं है. मैंने दो सेवा का बहूत पहले से लिया हुआ है. मगर जो मेरा धर्म है वही हिंदुस्तान में रहने वाले सब लोगों का भी हो यह कैसे हो सकता है इसका मतलब जो लोग हिंदू नहीं है उनके साथ ज़बरदस्ती करना होगा. हम चीख चीख कर कहते आए हैं कि ज़बरदस्ती से कोई धर्म नहीं चलना चाहिए. जो आदमी अपने आप गोकुशी नही रोकना चाहता उसके साथ मैं कैसे ज़बरदस्ती करूँ कि वह ऐसा करे ? भारतीय यूनियन में अकेले हिंदू तो यहाँ हैं नहीं. हाय नई पुलिस तो यहाँ तो मुसलमान रहा हूँ पारसी और वे ईसाई आदि सभी लोग रहते हैं. हिंदुओं का यह कहना कि अब हिन्दुस्तान हिंदुओं की भूमि बन गई है यह कहना बिलकुल ग़लत है। जो लोग यहाँ रहते हैं उन सबका इस भूमि पर अधिकार है. गाँधी जी
लोकसभा चुनाव 2024
अभी तो पहले चरण का ही मतदान हुआ है. लेकिन पहले ही चरण में भाजपा का पैर उखड़ता हुआ दिखाई दे रहा है . भाजपा नेताओं की कल रात की नींद उड़ गई होगी. चार सौ पार का नारा लगाने वालों के लिए दो सौ भी लांघ पाना हिमालय लांघने के बराबर दिखाई दे रहा है.
पिछले दस वर्षों में भाजपा चुनाव लड़ने के लिए मोदी जी के नाम पर ही निर्भर हो गई है. पंचायत का चुनाव हो या लोकसभा का , प्रत्येक चुनाव में मोदी जी का ही नारा सुनाई देता है. दरअसल मोदी जी के चरम व्यक्तिवाद, ‘एको अहं, द्वितीय नास्ति’ ने पूरी पार्टी को अपने उपर आश्रित बना दिया है.
मोदी जी पिछले दस वर्षों से देश के प्रधानमंत्री हैं. लेकिन उनकी सरकार ने देश के ग़रीबों के लिए, किसानों और बेरोज़गारों के लिए क्या किया है यह नहीं बताते हैं. इस चुनाव में भी मोदी की गारंटी और मोदी है तो मुमकिन है जैसे नारे पर भाजपा चुनाव लड़ रही है. भगवान राम, आस्था, राम नवमी में मछली खाना मुग़लिया दिमाग़, सनातन का अपमान आदि सांप्रदायिकता की ध्वनि मोदी जी के हर भाषण में सुनाई देती है. ऐसी बातें जिनका आम आदमी के सुख दुख से कोई रिश्ता नहीं है.
बल्कि मोदी जी ने दंभ में ऐसे ऐसे फ़ैसले लिए जिनसे देश आज तक उबर नहीं सका है. रिज़र्व बैंक की असहमति के बावजूद मोदी जी ने देश में नोटबंदी का फ़ैसला ले लिया. उसकी मार सबसे ज़्यादा ग़रीबों और छोटा मोटा व्यवसाय करने वालों पर पड़ी. जीएसटी के बोझ तले छोटे मोटे व्यवसाय करने वालों की कमर टूट रही है.
कोरोना काल को याद कीजिए. अचानक बग़ैर जानकार लोगों से सलाह मसविरा किये मोदी जी ने देश में कर्फ़्यू जैसी हालत पैदा कर दी. शहरों में काम बंद. मालिकों ने रहने का ठिकाना ख़ाली करा दिया. अब खायेंगे क्या? बिना काम शहर में भूख से मरने से गाँव लौट चला जाय. वहाँ भूख से तो नहीं मरेंगे. रेल भी बंद. याद कीजिए सरपर गठरी लादे बाल बच्चों समेत सड़कों पर, रेलवे लाइन के किनारे किनारे हज़ारों की संख्या में भारत का ग़रीब, सर्वहारा अपने अपने गाँव की ओर कूच कर रहा था. वही असली भारत की तस्वीर है.
मोदी जी कोरोना से जंग कैसे लड़ रहे थे ! थाली पीटो , मोबाइल का रोशनी जलाओ. दुनिया हँस रही थी. ऐसी सरकार और ऐसे प्रधानमंत्री को देश कब तक सहन करेगा ? इसलिए इस चुनाव में पहले चरण से ही इनकी विदाई का गीत सुनाई देने लगा है. शिवानन्द
मोदी और संघ जैसे विभाजक ताक़तों को पराजित करना ही आज का आपद धर्म और सच्ची देश भक्ति है.
कल राजस्थान की चुनावी सभाओं में प्रधानमंत्री जी को सुनना देश को शर्मसार करने वाला था. इतने बड़े मुल्क का प्रधानमंत्री इस तरह की भाषा बोल सकता है ! कांग्रेस सत्ता में आयेगी तो हिंदू महिलाओं का मंगल सूत्र छीन कर मुसलमानों में बाँट देगी. हिंदुओं की संपत्ति का सर्वेक्षण करा कर उसे ज़्यादा बच्चे पैदा करने वालों के बीच बाँट देगी. ऐसी भाषा वह प्रधानमंत्री बोल रहा है जिसने संविधान की किताब पर माथा टेक कर देश को वचन दिया था कि उसके लिए सबसे पवित्र धार्मिक ग्रंथ यही है. आज वही प्रधानमंत्री चुनाव में अपनी संभावित पराजय को देख कर इस प्रकार की नफरती भाषा का इस्तेमाल कर रहा है ताकि हिंदू उसके पक्ष में गोलबंद हो जाएँ! मोदी जी बार बार कह रहे हैं कि पिछले दस वर्षों का मेरा काम तो झांकी है. लेकिन देश को तो ऐसा कुछ नहीं दिखा है जिससे भविष्य में आपके प्रति भरोसा दिखाए.भविष्य में आपकी क्या योजना है यह भी आपने देश के सामने अभी तक नहीं रखा है. ग़रीबी, महंगाई, बेरोज़गारी से लोग तबाह हैं . दस वर्षों के आपके शासन में ग़रीबों और नौजवानों के लिए त्राहिमाम है लेकिन अमीरों के बल्ले बल्ले हैं. एक से बढ़कर एक पगड़ी और पोशाक पहन कर दिन रात आप बोलते रहते हैं. आपको ग़लतफ़हमी हो सकती है कि आपके भाषणों और पोशाकों से जनता को संतुष्ट रहना चाहिए. लेकिन लोग अगर संतुष्ट हो गये होते तो आपको नफ़रत फैलाने वाली भाषा बोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. प्रधानमंत्री को ऐसी भाषा बोलने की कौन सी बाध्यता हुई जिससे दुनिया भर में थू थू हो रही है ! इसको समझने के लिये इनके अतीत को जानना होगा. गुजरात में इनकी सरकार को स्थायित्व कैसे मिली इसको समझने के लिये हमें वहाँ की इनकी राजनीति को समझना होगा.
दरअसल मोदी जी का संकट यह है कि इन्होंने देश को भी गुजरात समझ लिया है. गुजरात में इन्होंने जिस तरह डूबती भाजपा को बचाया उसको जानने की ज़रूरत है. 7 अक्तूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी जी ने शपथ लिया था. इनके पहले केशो भाई पटेल वहाँ के मुख्यमंत्री थे. उनके नेतृत्व में भाजपा वहाँ नीचे लुढ़कती जा रही थी. विधानसभा के उपचुनावों में ही नहीं बल्कि स्थानीय निकाय के चुनावों में भी भाजपा की हार हो रही थी. इसी पृष्ठभूमि में केशो भाई पटेल को हटाकर मोदी जी को भाजपा ने गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया. उनके सामने चंद महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने की चुनौती थी.
7 अक्तूबर को मोदी जी के शपथ लेने लगभग चार महीना बाद 27 फ़रवरी को गोधरा कांड हो गया. उस कांड में गोधरा के पास साबरमती एक्सप्रेस गाड़ी के एक डब्बा में आग लग गई. उस दर्दनाक घटना में 59 लोग जल कर मर गए. पुलिस मैनुअल के निर्देश के विपरीत मृतकों के शव को बग़ैर ढँके दिन में शहर में घुमाया गया. उस संख्या में लाश देख कर लोगों में ग़ुस्सा भड़का और दंगा शुरू हो गया. ऐसा हो, इसी मक़सद से लाशों को सरेआम घुमाया गया. दंगा के दरम्यान पुलिस प्रशासन उपर के निर्देशानुसार मूक दर्शक बना रहा.
उसी पृष्ठभूमि में 12 दिसंबर 2002 को गुजरात विधानसभा का चुनाव हुआ. मोदी जी तो और पहले ही विधानसभा का चुनाव कराना चाहते थे. ताकि हिंदू-मुस्लिम बँटवारे का वे ज़्यादा से ज़्यादा लाभ उठा सकें. लेकिन उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त जेम्स लिंगदोह जो ईसाई थे उस गंभीर तनाव की स्थिति में चुनाव नहीं कराना चाहते थे. मुझे याद है कि उनके धर्म को लेकर मोदी जी उनपर ऐसा हमलावर हुए कि चुनाव आयोग को उसी पृष्ठभूमि में चुनाव कराना पड़ा. उस चुनाव में मोदी जी ने गुजरात में जीत की जो नींव डाली, उसी नींव पर आज तक वहाँ भाजपा की जीत का सिलसिला जारी है.
गुजरात के उस विधानसभा चुनाव (2002) में कांग्रेस पार्टी ने सहयोग के लिए लालू जी को भी आमंत्रित किया था. उसके पहले बिहार में आडवाणी जी को गिरफ़्तार करने के बाद लालू जी मुस्लिम दुनिया के ‘हीरो’ हो चुके थे. अपने साथ लालू जी मुझे भी गुजरात ले गए थे. वहाँ मैंने लालू जी के प्रति लोगों की और विशेष रूप से मुसलमानों की दीवानगी प्रत्यक्ष देखी.
मैंने यह समझने का प्रयास किया कि गुजरात के लोगों का समर्थन मोदी जी को क्यों मिल रहा है. चुनाव के बाद के सर्वेक्षण में मैंने देखा कि किस तरह हिंदुओं को मुसलमानों से डरवा कर उनका वोट लिया जा रहा है. उस समय वहाँ मुसलमानों की आबादी दस प्रतिशत से भी कम थी. सबसे पहले मोदी जी ने वहाँ के नब्बे प्रतिशत हिंदुओं के मन में दस प्रतिशत से भी कम आबादी वाले मुसलमानों का डर पैदा किया. उसके बाद मैं आपको सुरक्षा दूँगा इस नाम पर उनका वोट लिया और आज तक ले रहे हैं. इस विधि को अगर हम समझने का प्रयास करें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि सबसे पहले नब्बे प्रतिशत आबादी वाले हिंदुओं के मन में दस प्रतिशत मुसलमानों का डर पैदा किया. यानी पहले हिंदुओं को कायर बनाया.
इनकी मानसिकता क्या है उसका उदाहरण विलकिस बानो का मामला है. विलकिस के परिवार के दर्जन भर लोगों के साथ उसके बेटे की हत्या की गई. उस गर्भवती महिला के साथ उन लोगों ने बलात्कार किया. अभियुक्तों पर मुक़दमा चला आजीवन कारावास की सजा हुई. लेकिन जाल फ़रेब कर समय के पहले सरकार ने उनको जेल से मुक्त कर दिया. रिहाई के बाद उन बलात्कारियों और हत्यारों को माला पहनाकर उनको महिमा मंडित किया गया. मिठाइयां बाँटी गई. इतना ही नहीं बल्कि उन में से एक अभियुक्त की बेटी को उसी विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया गया जहां वह जघन्य घटना हुई थी. बाद में उस बहादुर महिला ने संघर्ष किया और सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों को फिर जेल भेजा.
इतना विस्तार से लिखने का मक़सद यह है कि मोदी जी और उनके पीछे जो ताक़त है उसको हम समझ सकें. मोदी जी समेत यह पूरा गिरोह बीमार मानसिकता के लोगों का है.
मोदी ने गुजरात में जो प्रयोग किया उसी को देश में दोहराना चाहते हैं. लेकिन यह देश गुजरात नहीं है. दरअसल प्रधानमंत्री जी न इस देश को समझते हैं और न हिंदू समाज को. यह देश विविधताओं से भरा हुआ है. बहुलताओं से भरा हुआ यह देश समावेशी है. इतनी भाषाएँ, इतनी बोलियाँ, भिन्न भिन्न रीति रिवाज, अलग-अलग परंपराओं वाले इस देश में सदियों से लोग एक साथ रहते आये हैं. हिंदू धर्म तो इतना समावेशी है कि इसके न एक भगवान हैं और न कोई एक धार्मिक ग्रंथ. अंग्रेज़ कहते थे कि इस देश के भीतर अनेक देश हैं. इसलिए उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि आज़ादी के बाद यह देश बिखर जाएगा.लेकिन ऐसा कहने वालों को इस देश ने ग़लत साबित किया.
दूर मत जाइए. बिहार को ही देखिए. कितनी बोलियाँ बोलने वाले यहाँ रहते हैं! भोजपुरी, मैथिली, मगही,वज्जिका, अंगिका. दो दो पंचांग है. मिथिला का पंचांग है. हमारी ओर बनारसी पंचांग चलता है. अगर नियम बने कि यहाँ सिर्फ़ मैथिली या भोजपुरी बोली जाएगी तो क्या होगा! सिवाय हंगामा और तनाव के. इसलिए इस देश को न मोदी जी समझते हैं न ही उनका राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ. ये देश की विविधता को मिटा कर इसे एक रंग में रंगना चाहते हैं. इसका नतीजा होगा कि यह देश बिखर जाएगा. कई टुकड़ों में बंट जाएगा. इसलिए जो लोकतंत्र और संविधान को समाप्त करने की आशंका जताई जा रही है वह काल्पनिक नहीं है. सत्ता जाने के भय से ये लोग बेचैन हैं. लेकिन यह देश वैसा नहीं है जिसकी ये लोग कल्पना करते हैं. यह सही है कि अलग अलग जातियों और मज़हबों के बीच लड़ाई झगड़े भी होते रहते हैं. लेकिन इनका असर अस्थायी होता है. फिर लौट कर वही समाज वही दुनिया. इसलिए इस देश को बचाने के लिए मोदी और संघ जैसी विभाजक ताक़तों को पराजित करना ही हमारा आपका आपद धर्म होना चाहिए. इनको पराजित करना ही आज सच्ची देश भक्ति है.
शिवानन्द
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