हिंसक ‘रिजीम चेंज’ गतिविधियों से जुड़े लोगों को यूपी में सरकारी नौकरी नहीं

  • हिंसक तरीकों से व्यवस्था परिवर्तन का उद्देश्य रखने वाले संगठनों के सदस्यों को सरकारी नौकरी से वंचित किया जा सकता है।

  • हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, पेपर लीक और संगठित अपराध जैसे गंभीर मामलों में निर्धारित कानूनी मानदंडों के आधार पर अयोग्यता तय होगी।

  • पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई को 30 दिनों के भीतर चरित्र सत्यापन रिपोर्ट देनी होगी।

  • केवल राजनीतिक विचारधारा या लंबित एफआईआर के आधार पर नियुक्ति रोकने की अनुमति नहीं होगी।

समग्र समाचार सेवा 

रामपुर, उत्तर प्रदेश  29 अक्टूबर: लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए चरित्र सत्यापन के नियमों को और सख्त कर दिया है। नई नीति के अनुसार, हिंसक तरीकों से शासन या मौजूदा व्यवस्था को बदलने का उद्देश्य रखने वाले संगठनों से जुड़े व्यक्तियों को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य माना जा सकता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध हिंसक गतिविधियों में संलिप्तता सरकारी नियुक्ति के रास्ते में गंभीर बाधा बन सकती है।

हालांकि, केवल किसी राजनीतिक विचारधारा से सहमति रखने, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने या एफआईआर दर्ज होने के आधार पर किसी उम्मीदवार को स्वतः अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद नई नीति

नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में नई चरित्र सत्यापन नीति जारी की है।

यह नीति राज्य सरकार के विभिन्न विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती के माध्यम से चयनित अभ्यर्थियों पर लागू होगी।

नए प्रावधानों के अनुसार, ऐसे संगठनों की सदस्यता जिनका घोषित उद्देश्य हिंसात्मक तरीकों से मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को बदलना है, सरकारी नियुक्ति में अयोग्यता का आधार बन सकती है।

तीन वर्षों की गतिविधियों की भी होगी जांच

नई नीति में उम्मीदवारों की पिछली गतिविधियों को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। यदि कोई व्यक्ति 21 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद चरित्र सत्यापन की तारीख से पिछले तीन वर्षों के भीतर हिंसक व्यवस्था परिवर्तन से संबंधित गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो इसे उसकी सक्रिय संलिप्तता का संकेत माना जा सकता है।

हालांकि, इस अवधि में संबंधित व्यक्ति के आचरण में सकारात्मक परिवर्तन के ठोस प्रमाण उपलब्ध होने पर उसके मामले पर पुनर्विचार किया जा सकता है।

इस प्रावधान का उद्देश्य उम्मीदवार की वर्तमान उपयुक्तता का आकलन करना है।

गंभीर अपराधों में शामिल उम्मीदवारों पर सख्ती

सरकार ने गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े उम्मीदवारों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं। हत्या, दुष्कर्म, अपहरण, आतंकवादी गतिविधियों, भ्रष्टाचार, धनशोधन, साइबर अपराध, परीक्षा में नकल कराने वाले गिरोह और प्रश्नपत्र लीक जैसे मामलों में आरोप तय होने या दोषसिद्धि जैसी निर्धारित कानूनी स्थितियों के आधार पर उम्मीदवार को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य माना जा सकता है।

सरकार का उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं में नियुक्त होने वाले कर्मचारियों की विश्वसनीयता और प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता सुनिश्चित करना बताया गया है।

30 दिन में पूरी होगी पुलिस सत्यापन प्रक्रिया

नई व्यवस्था के तहत जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) को अनुरोध प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर चरित्र सत्यापन रिपोर्ट संबंधित नियुक्ति प्राधिकारी को भेजनी होगी।

सत्यापन के लिए उम्मीदवार के घर जाना या उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य नहीं होगी। सामान्यतः उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर जांच की जाएगी।

यदि सत्यापन रिपोर्ट प्रतिकूल आती है, तो जिलाधिकारी की ओर से अंतिम संस्तुति भेजे जाने से पहले उम्मीदवार को ऑनलाइन अथवा व्यक्तिगत रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा।

इसके अतिरिक्त, चरित्र सत्यापन लंबित होने की स्थिति में निर्धारित स्वघोषणा पत्र और दस्तावेजों के आधार पर औपबंधिक नियुक्ति पत्र जारी किया जा सकेगा। गलत जानकारी देने या बाद में अयोग्य पाए जाने पर नियुक्ति रद्द की जा सकती है।

विपक्ष ने उठाए सवाल, राजनीतिक विवाद तेज

योगी सरकार के इस निर्णय पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने नई नीति की आलोचना की है। विपक्ष की ओर से ऐसे प्रावधानों के दुरुपयोग और विरोध प्रदर्शन करने वाले युवाओं पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

वहीं शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि केवल राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। हिंसक गतिविधियों में वास्तविक संलिप्तता और निर्धारित कानूनी मानदंड ही निर्णय का आधार होंगे।

लोकतांत्रिक विरोध और हिंसक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर जरूरी

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण विरोध, असहमति और संवैधानिक तरीकों से सरकार बदलने की मांग लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। लेकिन राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या कानून-व्यवस्था को बाधित करना अलग विषय है।

उत्तर प्रदेश सरकार की नई नीति इसी अंतर को रेखांकित करने का प्रयास करती है।

हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि चरित्र सत्यापन निष्पक्ष, प्रमाण-आधारित और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप किया जाए।

सरकारी सेवा में ईमानदारी, अनुशासन और कानून के प्रति सम्मान महत्वपूर्ण हैं। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि किसी निर्दोष उम्मीदवार को केवल आरोप, राजनीतिक असहमति या अप्रमाणित जानकारी के कारण नौकरी से वंचित न होना पड़े।

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