- भाजपा ने पहले उत्तराखंड में यूसीसी लागू कर इसकी सामाजिक- कानूनी प्रतिक्रिया पर नजर रखी।
- यूपी में भारी जनसंख्या और विविध सामाजिक संरचना के कारण यूसीसी लागू करने में सावधानी बरती जा रही है।
- योगी सरकार ने अब तक यूसीसी पर कोई समिति नहीं बनाई, लेकिन कई सार्वजनिक बयान दिए हैं।
- केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्तर पर यूसीसी लागू करने की संभावनाओं का यूपी इंतजार कर रहा है।
समग्र समाचार सेवा
उत्तर प्रदेश लखनऊ 3 जुलाई :पिछले 12 वर्षों में भाजपा ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करने में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिसका उद्देश्य सभी भारतीय नागरिकों के लिए विवाह, तलाक और विरासत के मामलों में एक समान, धर्मनिरपेक्ष कानून बनाना है। हालांकि, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में इस पर अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
यूसीसी की शुरुआत और रणनीति
2024 में उत्तराखंड, भाजपा शासित पहला राज्य बना जिसने यूसीसी लागू किया। इस छोटे राज्य में इसे लागू कर पार्टी ने इसके सामाजिक और कानूनी प्रभाव का अध्ययन किया। उत्तराखंड का कानून उच्च न्यायालय में चुनौती के बाद भी भाजपा ने आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई है।
यूपी में देरी के कारण
भाजपा ने 2022 विधानसभा चुनावों में यूसीसी को घोषणापत्र में शामिल नहीं किया था, इसलिए चुनावी दवाब नहीं है। उत्तर प्रदेश की विशाल आबादी, जिसमें करीब 20% मुस्लिम और विभिन्न जाति-समुदाय शामिल हैं, के कारण बिना तैयारी यूसीसी लागू करना कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई मौकों पर यूसीसी के समर्थन में बयान दिए, लेकिन अभी तक कोई समिति या कानून नहीं बन पाया है।
राष्ट्रीय स्तर पर विधेयक का इंतजार
केंद्र सरकार के संसद में दो-तिहाई बहुमत मिलने के बाद समान नागरिक संहिता का राष्ट्रीय विधेयक पारित करने की संभावना है। यूपी सरकार फिलहाल कानून व्यवस्था और केंद्र सरकार के नए आपराधिक कानूनों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
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