प्रधान मंत्री मोदी प्रसंग : “क्षमा धर्मस्य मूलं हि” (क्षमा धर्म का मूल है।)

पूनम शर्मा
भारतीय संस्कृति में क्षमा का स्थान
भारतीय संस्कृति सहिष्णुता, क्षमा और करुणा के गुणों का अनमोल संगम है। हमारे धार्मिक ग्रंथ—रामचरितमानस और महाभारत—इन मूल्यों को जीवन का मार्गदर्शन मानते हैं। आज के दौर में भी, जब समाज और राजनीति में तनाव और कटुता देखी जाती है, ऐसे गुणों का सार्वजनिक जीवन में उजागर होना हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।

रावण की मृत्यु के बाद व्यवहार श्रीराम विभीषण को आदेश देते हैं कि रावण का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ हो, यहाँ तक कि शत्रु के प्रति भी क्षमा और आदर दिखाते हैं। रावण के भाई विभीषण को शरण देना श्रीराम की क्षमा और करुणा का जीता-जागता प्रमाण है।युधिष्ठिर ने बार-बार कौरवों को क्षमा किया और शांति का मार्ग चुना, भले ही अपमान और अन्याय सहना पड़ा। भीष्म ने अपनी माता गंगा द्वारा किए गए अन्यायों को क्षमा कर दिया।युद्ध के बाद जब अश्वत्थामा ने पांडव-पुत्रों की हत्या कर दी, द्रौपदी ने अर्जुन से कहा कि उसे क्षमा करें।
“यथा मां तव पुत्रेषु कृष्णा सर्वेषु नित्यदा।
तथा कुरुष्व पार्थ त्वमप्येनं जीवितं प्रति॥” “क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम्।
क्षमा शौर्यम् क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा तपः॥”
(क्षमा ही धर्म, क्षमा ही यज्ञ, क्षमा ही वेद, क्षमा ही सत्य, क्षमा ही दान है।)

भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा क्षमा

हाल ही में, हमारे देश के प्रधानमंत्री के प्रति कुछ युवाओं ने सार्वजनिक मंच पर आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया। यह नासमझी, भटकाव और देशविरोधी ताकतों के उकसावे का परिणाम था। इन बच्चों को क्षमा करना, उनके सामने जाकर उन्हें माफ करना, प्रधानमंत्री की महानता, सहिष्णुता और भारतीय संस्कृति के मूल्यों का परिचायक है।

प्रधानमंत्री ने जिस सहजता और विनम्रता से क्षमा का आचरण किया, वह सच्चे नेतृत्व का प्रतीक है। यह घटना बताती है कि शक्ति के साथ क्षमा का संतुलन ही सभ्यता और संस्कृति की ऊँचाई है। वे इतने शक्तिशाली होते हुए भी, अहंकार से दूर, बच्चों को गलती सुधारने का अवसर देते हैं।
यह क्षमा केवल उनका व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है—जहाँ सबसे बड़ा योद्धा भी क्षमा को अपना सबसे बड़ा शौर्य मानता है।

नैतिकता और मूल्यों की कमी माता-पिता जिम्मेदार

आज हमारे समाज में नैतिकता और मूल्यों की कमी के कारण, कुछ लोग अनैतिक तरीकों से सफलता प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए शॉर्टकट, जैसे कि पैसे देकर पेपर खरीदना, अपना रहे हैं। इस प्रवृत्ति के कारण बच्चों में भी नैतिकता की जगह गलत आदतें घर कर रही हैं।

नीट (NEET) पेपर लीक की घटनाओं में देश के किसी भी जिम्मेदार नेता—चाहे वह धर्मेन्द्र प्रधान हों या हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी—की कोई भूमिका नहीं है। जिन लोगों ने यह अपराध किया है, वे पूरी तरह से कानून के दोषी हैं। सरकार और जिम्मेदार संस्थाएं लगातार इन मामलों की जाँच  कर रही हैं और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जा रही है। यह समाज के चारित्रिक पतन का फल है । समाज के प्रत्येक नागरिक को यह बात समझनी होगी कि स्वस्थ्य एवं दोषमुक्त समाज का निर्माण मात्र और मात्र माता  पिता का सत्य आचरण ही कर सकता है ।

यह समस्या केवल कानून व्यवस्था की नहीं, बल्कि समाज के नैतिक पतन की भी है। जब माता-पिता स्वयं अपने बच्चों को अनैतिकता की ओर बढ़ावा देंगे, तो समाज में ऐसे ही कृत्य बढ़ेंगे। हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथ—जैसे रामायण, महाभारत, गीता—हमें सच्चाई, ईमानदारी और कर्तव्य-पालन की शिक्षा देते हैं। लेकिन आज बहुत से लोग इन मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं।

समाज में नैतिक शिक्षा की पुनर्स्थापना आवश्यक है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों के लिए आदर्श बनें, उन्हें मेहनत, ईमानदारी, और उच्च नैतिक मूल्यों का महत्व समझाएँ। बच्चों को शॉर्टकट दिखाने की बजाय, उन्हें सच्चाई और कड़ी मेहनत की सीख दें। तभी हमारा समाज सशक्त, न्यायप्रिय और उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर होगा।

“क्षमा वीरस्य भूषणम्” – क्षमा वीरों का आभूषण है। क्षमा समाज में प्रेम, शांति और सद्भावना की नींव है। यह परिवार, समाज, और राष्ट्र में स्वस्थ, सकारात्मक वातावरण बनाती है। भारतीय संस्कृति में क्षमा, सहिष्णुता और सहानुभूति सर्वोपरि हैं। हमारे ग्रंथों, इतिहास और आज के जीते-जागते उदाहरणों से स्पष्ट है कि क्षमा केवल कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ा शौर्य है।

प्रधानमंत्री द्वारा बच्चों को क्षमा करना हमारे लिए सीख है कि शक्ति, ज्ञान और नेतृत्व का वास्तविक आधार करुणा, क्षमा और उदारता है।
आइए, हम सब मिलकर इस मूल्य को अपने जीवन में उतारें और एक सशक्त, संतुलित और प्रेरणादायक भारत का निर्माण करें।भारतीय संस्कृति लाखों  वर्षों से मानवता, सहिष्णुता और क्षमा के मूल्यों का पोषण करती आई है। ये मूल्य केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे जीवन, समाज और राष्ट्र-निर्माण में गहराई से जुड़े हैं। क्षमा न केवल एक व्यक्तिगत गुण है, बल्कि यह समाज और राष्ट्र को जोड़ने वाली वह डोर है, जो विविधताओं के बावजूद एकता बनाए रखती है।

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