- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी (NJA) की समिति ने यौन अपराध मामलों में न्यायिक भाषा को अधिक सम्मानजनक और पीड़ित-केंद्रित बनाने की सिफारिश की।
- समिति ने ‘प्रॉसिक्यूट्रिक्स’, ‘लज्जा भंग’, ‘इज्जत’, ‘शर्म’, ‘चरित्र’ जैसे शब्दों के बजाय ‘पीड़ित’, ‘सर्वाइवर’, ‘यौन हमला’, ‘शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन’ जैसे शब्द अपनाने की सलाह दी।
- रिपोर्ट में कहा गया—न्यायिक भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि निष्पक्ष और संवेदनशील न्याय का आधार है।
- समिति का नेतृत्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने किया; गठन सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी 2026 के आदेश पर हुआ।
- रिपोर्ट में नौ प्रमुख सिद्धांत सुझाए गए—साक्ष्य-आधारित निर्णय, लैंगिक तटस्थ भाषा, बच्चों के लिए संवेदनशील शब्दावली, सहमति और शारीरिक स्वायत्तता पर जोर, मनोवैज्ञानिक आघात की समझ।
- सुधारों में FIR के शुरुआती चरण से कानूनी मदद, पीड़ित मुआवजा, गवाह सुरक्षा, इन-कैमरा कार्यवाही, अपमानजनक जिरह से बचाव, पहचान की गोपनीयता शामिल।
- समिति ने अदालतों को सलाह दी—पीड़िता के कपड़े, देरी, या रात में बाहर होने जैसे प्रश्नों से बचें, केवल प्रासंगिक साक्ष्य और कानून पर ध्यान दें।
- विशेषज्ञों का मानना—भाषा में बदलाव से यौन अपराध मामलों की सुनवाई अधिक संवेदनशील और निष्पक्ष होगी।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 4 अगस्त: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी (NJA) की विशेषज्ञ समिति ने यौन अपराध मामलों में न्यायिक भाषा में बदलाव की सिफारिश की है।
रिपोर्ट में न्यायाधीशों को सलाह दी गई है कि वे ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों से बचें जो पितृसत्तात्मक या रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा दें, और पीड़ित के लिए मानसिक आघात का कारण बनें।
समिति ने “प्रॉसिक्यूट्रिक्स” की जगह “पीड़ित” या “सर्वाइवर”, “लज्जा भंग” की जगह “यौन हमला” जैसे शब्दों के प्रयोग की सिफारिश की है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल साक्ष्यों और कानून पर आधारित निष्पक्ष निर्णय देना है, न कि नैतिकता या सामाजिक मानकों का आकलन।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सिफारिशों के प्रभावी क्रियान्वयन से यौन अपराध मामलों की सुनवाई अधिक संवेदनशील, निष्पक्ष और पीड़ित-केंद्रित बन सकेगी।
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