बदलते रिश्ते और उपयोगिता का दौर: एक सामाजिक नजरिया

समग्र समाचार सेवा

आज के समय में यदि गांव देहात में किसी पशुपालक की गाय या भैंस बछड़ा/पाड़ा को जन्म दे, तो वह दुखी हो जाता है। कोई पड़ोसी पूछे तो उदास भाव से सर झुका कर धीरे से कहते हैं, बछड़ा हुआ है… जबतक दूध निकालने के लिए उनकी जरूरत होती है, तबतक उन्हें चारा पानी दे कर रखते हैं, दूध छूटते ही अधिकांश लोग बेच देते हैं। उसके बाद? मान लीजिए कि अधिकांश बछड़े कसाईखानों तक पहुंच जाते हैं। शहरों के बड़े पशु कृषक तो बछड़ों को जन्म के समय ही मारने लगे हैं क्योंकि उन्हें दूध निकालने के लिए बछड़ों की जरूरत ही नहीं होती…

मात्र दो तीन दशक पहले तक ऐसा नहीं था। जबतक किसान खेतों में बिछड़े से हल चलवाता था, उनसे बैलगाड़ी खिंचवाता था, तबतक बछड़ों की पूछ थी। उन्हें ऊंचे दामों पर खरीदा बेचा जाता था। उनके चारा, दाना आदि की विशेष व्यवस्था होती, उन्हें सजा धजा कर रखा जाता, वे दरवाजे की प्रतिष्ठा कहे जाते थे।

हमारी ओर एक परंपरा है कि परिवार के मालिक की सप्ताह के जिस दिन मृत्यु होती है, वह दिन उसके बच्चों के लिए “मान” हो जाता है। उस दिन परिवार में कोई शुभ कार्य, कोई शुभ यात्रा नहीं होती। हां भविष्य में उसी दिन घर में बालक का जन्म हो जाय, या गाय बछड़े को जन्म दे दे तो मान का भेद समाप्त हो जाता है। अर्थात बछड़े का जन्म उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, जितना एक बालक का।

तो अब बछड़ों के तिरस्कार का कारण क्या है? कारण है उनकी उपयोगिता का खत्म हो जाना। अब किसान किस लिए उन्हें रखे, उनकी सेवा करे? सेवाभाव वाला युग रहा नहीं, और देने को वे सिवाय गोबर के और कुछ नहीं दे सकते… इसलिए धर्मभीरू लोग यूं ही हांक देते हैं, और कुछ लोग सीधे कसाई के हाथों बेंच देते हैं।
लगभग ऐसी ही स्थिति होती थी तवायफों के यहां जन्म लेने वालों बालकों की। वे जन्म से ही तिरस्कार पाते थे। कुछ बेंच दिए जाते, कुछ भगा दिए जाते, कुछ थोड़े बड़े होते ही तिरस्कार के कारण स्वयं भाग जाते, और कुछ तो मार दिए जाते थे। तवायफों की स्थिति भी वही थी, कोठों पर लड़कों की उपयोगिता ही नहीं थी।

वहां लड़कियां जन्म लेतीं तो खुशियां मनाई जाती थीं। मिठाई बंटती, हफ्तों जश्न होता, धूम रहती… वह लड़की बाद में मां की उत्तराधिकारी होती, उसी के सहारे मां का बुढ़ापा भी शान से कटता… तो लड़कियों का सत्कार और लड़कों का तिरस्कार स्वाभाविक ही था।

तवायफ लड़कियों के लिए भाई एक अनावश्यक वस्तु होता था। उनके जीवन में उसकी क्या ही जरूरत होनी थी? उनके लिए भाई से अधिक पाले गए कुत्ते महत्वपूर्ण होते थे। उनके जीवन में कुत्ते की जरूरत थी, भाई की जरूरत नहीं थी। इसमें उनका दोष नहीं था, उनका जीवन ही ऐसा था कि उसमें भाई के लिए कोई जगह नहीं थी।
कुल मिला कर बात यह कि जब जहां जिस वस्तु की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, वहां उस वस्तु की प्रतिष्ठा भी खत्म हो जाती है। फिर क्या भाई और क्या कुत्ता…
उस राखी वाले विज्ञापन में कीर्ति सेनन द्वारा कुत्ते को राखी बांधते देख कर याद आया… वहां भी कुत्ता अधिक महत्वपूर्ण है, भाई कम…

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