विविधता में एकता भारत के डीएनए में है: मोहन भागवत
आरएसएस प्रमुख ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में वैश्विक मंच से कहा कि विविधता प्रकृति का नियम है और एकता ही परम सत्य है।
- आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल ओणम सेलिब्रेशन’ में मुख्य वक्तव्य दिया।
- उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘विविधता में एकता’ भारत की संस्कृति और डीएनए का मूल हिस्सा है।
- भागवत ने वैश्विक स्तर पर भाईचारे, पर्यावरण संरक्षण और समाज में आपसी तालमेल की आवश्यकता पर बल दिया।
नया न्यूयॉर्क (अमेरिका),1 सितंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित ऐतिहासिक मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल ओनेस सेलिब्रेशन’ को संबोधित करते हुए दुनिया भर में शांति, समरसता और सह-अस्तित्व का संदेश दिया। अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) फोरम द्वारा आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में विभिन्न देशों से आए हजारों प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। अपने मुख्य संबोधन में भागवत ने स्पष्ट किया कि भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान ‘विविधता में एकता’ के शाश्वत सिद्धांत पर टिकी हुई है, जो हर दौर में पूरी मानवता के लिए मार्गदर्शक रही है।
विविधता है एकता की सजावट
अपने विचार रखते हुए आरएसएस प्रमुख ने कहा कि जहां अमेरिका जैसे देशों में अक्सर ‘बहुसंस्कृतिवाद’ (Pluralism) की चर्चा होती है, वहीं भारत की पहचान ‘अनेकताओं में एकता’ से जुड़ी है। उन्होंने बहुत ही सुंदर शब्दों में कहा कि “विविधता प्राकृतिक है और एकता ही सत्य है”। विविधता हमारी एकात्मकता या जुड़ाव को कमजोर नहीं करती, बल्कि यह उस साझी संस्कृति की सबसे खूबसूरत सजावट की तरह है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को समझाया कि भौतिक रूप से भले ही हमारे तौर-तरीके, भाषाएं और जीवनशैलियां भिन्न हों, लेकिन अंततः हर मानव के भीतर एक ही चेतना निवास करती है।
नदियों और पर्वों से परे राष्ट्रों का बड़ा उद्देश्य
स्वामी विवेकानंद के विचारों का हवाला देते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि दुनिया का कोई भी राष्ट्र महज भूगोल की सीमा या नक्शे तक सीमित नहीं होता है। हर देश और संस्कृति का एक बड़ा उद्देश्य और नियति तय होती है। उन्होंने कहा कि भारत का ऐतिहासिक और वैश्विक दायित्व पूरी दुनिया को यह समझाना है कि कैसे विभिन्न संस्कृतियां और विचार बिना किसी टकराव के एक साथ सामंजस्य बैठाकर आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि धर्म का अर्थ किसी पूजा-पद्धति या मजहब विशेष से नहीं है, बल्कि वह सनातन नियम है जो पूरी सृष्टि और ब्रह्मांड को आपस में बांधकर संतुलित रखता है।
प्रकृति और समाज के प्रति कर्तव्यों की याद
कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने पर्यावरण संरक्षण और समाज के प्रति मानवीय दायित्वों पर भी विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अन्न उपगाने वाले किसानों, दैनिक श्रम करने वाले मजदूरों और उद्योगों से लेकर प्रकृति तक, हर कोई हमारी दैनिक जरूरतों को पूरा करने में योगदान देता है। इसलिए यह हमारा सामूहिक कर्तव्य बनता है कि हम पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी जवाबदेही को समझें। प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस भी देश (कर्मभूमि) में रह रहे हैं, वहां पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करें, साथ ही अपनी जन्मभूमि के सांस्कृतिक मूल्यों को भी जीवित रखें।
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