कुमार राकेश, नई दिल्ली, 13 सितंबर:
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit 2026) के दौरान अपनाया गया ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ (New Delhi Declaration) वैश्विक कूटनीति और भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा मोड़ लेकर आया है। इस ऐतिहासिक घोषणापत्र ने वैश्विक शासन में सुधार और संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए भारत को कूटनीतिक केंद्र बिंदु पर ला खड़ा किया है। ब्रिक्स समूह ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की मजबूत भूमिका का खुलकर समर्थन किया है, जिससे वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति और अधिक सुदृढ़ हुई है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सुधारों को मिला समर्थन
भारत के लिए इस शिखर सम्मेलन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण परिणाम संयुक्त राष्ट्र (UN) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों के प्रति समर्थन का फिर से दोहराया जाना है। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों—रूस और चीन—दोनों ने संयुक्त राष्ट्र में भारत और ब्राजील की आकांक्षाओं का समर्थन किया है। यह विकास भारत की उस लंबे समय से चली आ रही मांग को नई कूटनीतिक ताकत देता है, जिसमें वैश्विक शासन संरचना को अधिक प्रतिनिधिपूर्ण बनाने पर जोर दिया जाता रहा है। घोषणापत्र में यह आह्वान किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करना चाहिए और विकासशील देशों को इसमें उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन में बदलाव
ब्रिक्स बिजनेस फोरम के दौरान, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते संतुलन पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने रेखांकित किया कि पिछले पांच वर्षों में ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी में 40 प्रतिशत से अधिक हो गई है, जबकि पारंपरिक पश्चिमी देशों के समूह जी-7 (G7) की हिस्सेदारी लगभग 29 प्रतिशत के आसपास रही है। इस आंकड़े ने पारंपरिक पश्चिमी-नेतृत्व वाले समूहों के प्रभुत्व पर नए सिरे से सवाल खड़े किए हैं और बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत को बल दिया है।
शांति और संवाद की दिशा में प्रधानमंत्री मोदी की पहल
शिखर सम्मेलन के दौरान शांति और कूटनीति का मुद्दा सबसे आगे रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ अपनी द्विपक्षीय बैठक में एक बार फिर स्पष्ट किया कि संघर्षों को सुलझाने का एकमात्र रास्ता संवाद और कूटनीति (Dialogue and Diplomacy) ही है। उन्होंने दोहराया कि भारत शांति प्रयासों में हरसंभव सहायता देने के लिए पूरी तरह तैयार है।
वर्तमान भू-राजनीतिक माहौल में भारत की भूमिका बेहद अहम हो गई है। रूस-यूक्रेन संघर्ष के साथ-साथ ईरान और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े तनावों के बीच भारत सभी पक्षों के साथ अपने कूटनीतिक चैनल खुले रखे हुए है। गहरे होते भू-राजनीतिक विभाजनों के इस दौर में नई दिल्ली संवाद को सुगम बनाने में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा सकती है। रूस ने भी यह संकेत दिया है कि वह यूक्रेन संघर्ष को शांतिपूर्ण तरीकों से हल करने के उद्देश्य से भारत के प्रयासों का स्वागत करेगा।
सांस्कृतिक और जन-से-जन कूटनीति का प्रभाव
सामरिक और आर्थिक जुड़ाव के अलावा, भारत अपनी सभ्यतागत कड़ियों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच आपसी संपर्कों (People-to-people contacts) को एक ऐसे उपकरण के रूप में उपयोग कर रहा है जो संघर्ष काल के दौरान विश्वास पैदा करने और बातचीत के लिए जगह बनाने में मदद करता है। ब्रिक्स का यह परिणाम केवल संस्थागत सुधारों से कहीं आगे तक जाता है। रूस और चीन के साथ अपने संबंधों, ईरान के साथ जुड़ाव, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संवाद और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय साख के साथ, नई दिल्ली एक व्यापक शांति-निर्माण और मध्यस्थता-उन्मुख कूटनीतिक भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
निष्कर्ष
‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ और शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के द्विपक्षीय संवादों ने इस संदेश को पूरी मजबूती के साथ दुनिया के सामने रखा है कि वैश्विक संघर्षों को केवल टकराव के जरिए हल नहीं किया जा सकता है। उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के केंद्र में संवाद, कूटनीति और समावेशी बहुपक्षवाद (Inclusive Multilateralism) का होना अनिवार्य है, और इस पूरी प्रक्रिया में भारत ने वैश्विक शांति के एक बड़े पैरोकार के रूप में अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत कर लिया है।
(यह आलेख वैश्विक शासन और कूटनीति में भारत की बढ़ती भूमिका और ब्रिक्स घोषणापत्र के दूरगामी प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। वर्तमान समय में जब दुनिया कई मोर्चों पर तनाव का सामना कर रही है, तब नई दिल्ली की यह कूटनीतिक पहल पूरी दुनिया के लिए एक नई उम्मीद की किरण लेकर आई है।)
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