
डॉ. प्रियदर्शिनी पुरोहित
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और वैश्विक विखंडन से जूझ रही है। ऐसे में भारत की अध्यक्षता में ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ का संदेश केवल एक कूटनीतिक प्राथमिकता नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के मूल चिंतन की वैश्विक अभिव्यक्ति भी है।
ब्रिक्स आज वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभर चुका है। आर्थिक सहयोग और सतत विकास की भावना से शुरू हुआ यह समूह प्रारंभ में चार देशों का मंच था, जो अब विस्तारित होकर 11 सदस्य देशों का संगठन बन चुका है। इसकी बढ़ती भूमिका इस बात का संकेत है कि वैश्विक व्यवस्था अब केवल कुछ विकसित शक्तियों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहने के बजाय अधिक बहुध्रुवीय स्वरूप ग्रहण कर रही है। क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर ब्रिक्स देशों की सामूहिक अर्थव्यवस्था विश्व अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय हिस्सेदारी रखती है और विकासशील देशों की बढ़ती आर्थिक क्षमता को रेखांकित करती है। आज ब्रिक्स की सफलता इस तथ्य से प्रमाणित होती है कि विश्व की कुल जीडीपी (क्रय शक्ति समता के संदर्भ में) का 40 प्रतिशत हिस्सा ब्रिक्स का है, जो जी7 से लगभग 11 प्रतिशत अधिक है। ब्रिक्स सदस्य राष्ट्रों की विकास दर लगभग चार प्रतिशत है जबकि जी7 राष्ट्रों की 1 प्रतिशत ही।
इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ब्रिक्स को केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं मानता, बल्कि इसे विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच संवाद, सहयोग और साझा हितों को आगे बढ़ाने के माध्यम के रूप में देखता है। भारतीय दृष्टिकोण में राष्ट्रीय हितों की रक्षा और वैश्विक सहयोग के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।
ब्रिक्स की भूमिका ऐसे समय में और बढ़ जाती है, जब विश्व अनेक स्तरों पर अस्थिरता का सामना कर रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में जारी संघर्ष, बढ़ते सामरिक तनाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और परस्पर अविश्वास ने वैश्विक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसी परिस्थितियों में युद्ध को समाधान मानने के बजाय संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक प्रबल हो गई है।
भारत की अध्यक्षता में सम्मेलन का विषय—‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’—इसी आवश्यकता को सामने रखता है। यह विषय भारतीय सभ्यता के उस चिंतन से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसमें संघर्ष के स्थान पर सह-अस्तित्व, वर्चस्व के स्थान पर समन्वय और विनाश के स्थान पर सृजन को महत्व दिया गया है। भारतीय परंपरा का मूल स्वर सदैव शांति और सौहार्द का रहा है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना संसार को एक परिवार के रूप में देखने का आग्रह करती है। आज जब राष्ट्र अपने-अपने हितों की सुरक्षा के लिए अधिक आक्रामक रणनीतियां अपना रहे हैं, तब यह दृष्टिकोण वैश्विक शांति के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत कर सकता है।
लचीलापन : बदलती दुनिया में भारत का दृष्टिकोण
ब्रिक्स 2026 के विषय में ‘लचीलापन’ को प्रमुख स्थान दिया गया है। भारतीय चिंतन में परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने और सहिष्णु बने रहने की परंपरा रही है। कठोरता के बजाय संतुलन और संवाद को महत्व देना भारतीय सामाजिक एवं दार्शनिक परंपरा की विशेषता रही है।
भारत की विदेश नीति में भी इस दृष्टिकोण की झलक मिलती है। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए विभिन्न शक्तियों के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते खुले रखे हैं। यह लचीलापन किसी कमजोर रुख का परिचायक नहीं, बल्कि बदलती परिस्थितियों में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता है।
नवाचार : परंपरा और आधुनिकता का संगम
सम्मेलन के विषय में ‘नवाचार’ को शामिल किया जाना भी भारतीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। भारत की ज्ञान परंपरा में नवाचार और वैज्ञानिक जिज्ञासा का लंबा इतिहास रहा है। चरक, सुश्रुत और आर्यभट्ट जैसे विद्वानों से लेकर आधुनिक भारत में जगदीश चंद्र बोस, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और ई. श्रीधरन जैसे व्यक्तित्वों तक, भारतीय प्रतिभा ने विज्ञान, तकनीक और निर्माण के क्षेत्र में अपनी क्षमता का परिचय दिया है।
भारत के लिए नवाचार का अर्थ केवल आधुनिक तकनीक का विकास नहीं है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए नई चुनौतियों के समाधान तलाशना भी है। यही परंपरा और आधुनिकता का समन्वय भारत को वैश्विक नवाचार व्यवस्था में विशिष्ट स्थान प्रदान कर सकता है।
सहयोग: सतत विकास की कुंजी
ब्रिक्स 2026 के विषय का तीसरा महत्वपूर्ण पक्ष है—‘सहयोग’। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां स्पष्ट करती हैं कि कोई भी राष्ट्र अकेले जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, तकनीकी असमानता और आर्थिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता। सतत विकास के लिए राष्ट्रों के बीच सहयोग अनिवार्य है। युद्ध और संघर्ष विकास की गति को बाधित करते हैं, संसाधनों को विनाश की ओर मोड़ते हैं और मानव कल्याण को प्रभावित करते हैं। इसके विपरीत सहयोग, संवाद और साझी जिम्मेदारी विकास को व्यापक एवं टिकाऊ आधार प्रदान कर सकते हैं। भारतीय सभ्यता में सहयोग और समन्वय की यह भावना ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के विचार में दिखाई देती है। स्वामी विवेकानंद, गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी के विचार भी मानवता, सह-अस्तित्व, करुणा और शांति की इसी व्यापक भावना को रेखांकित करते हैं। आज की वैश्विक राजनीति में इन विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ गई है।
स्थिरता
ब्रिक्स 2026 का अंतिम महत्वपूर्ण आयाम ‘स्थिरता’ है। विकास तभी सार्थक हो सकता है, जब वह शांति, सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन के साथ आगे बढ़े। आर्थिक प्रगति यदि अस्थिरता और संघर्ष को जन्म देती है, तो वह दीर्घकालिक मानव कल्याण सुनिश्चित नहीं कर सकती। इसलिए भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स का यह एजेंडा केवल सदस्य देशों के आर्थिक हितों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसे ऐसी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जिसमें विकासशील देशों की आवाज को अधिक महत्व मिले, तकनीक और संसाधनों तक समान अवसर सुनिश्चित हों तथा वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और संतुलन स्थापित हो।
ब्रिक्स 2026 का विषय इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इसमें भारत की सभ्यता और आधुनिक कूटनीतिक दृष्टिकोण का एक स्वाभाविक मेल दिखाई देता है। लचीलापन परिस्थितियों के साथ संतुलित ढंग से आगे बढ़ने की सीख देता है, नवाचार भविष्य की चुनौतियों के समाधान का मार्ग खोलता है, सहयोग साझा विकास की नींव रखता है और स्थिरता उस विकास को दीर्घकालिक आधार प्रदान करती है। आज विश्व को शक्ति-प्रदर्शन की नहीं साझेदारी की, संघर्ष की नहीं संवाद की और प्रतिस्पर्धा की नहीं सहयोग की आवश्यकता है। भारत यदि अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक क्षमताओं के बीच संतुलन स्थापित करते हुए ब्रिक्स को आगे बढ़ाता है, तो यह मंच वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने के साथ-साथ अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अंततः, ब्रिक्स 2026 का संदेश यही है कि विकास और शांति को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारतीय सभ्यता का मूल मंत्र भी यही रहा है कि मानवता का कल्याण सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। ऐसे समय में जब दुनिया विभाजन की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना और ‘सहयोग से स्थिरता’ का मार्ग ही मानवता को विनाश से निकालकर साझा समृद्धि की ओर ले जा सकता है।
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