भारतीय समावेशी समाज पर आधुनिकता की काली छाया

✍🏻 पार्थसारथि थपलियाल

माना कि परिवर्तन अवश्यंभावी है, नदी के पानी में नहाते हुए स्पर्श होते ही पानी वही नहीं रह जाता जिसने अभी स्पर्श किया था। यह प्रवाह का परिवर्तन है। तालाब के पानी में ऐसा परिवर्तन नहीं होता। एक परिवर्तन बाँध वाले पानी का भी होता है। यह परिवर्तन प्राकृतिक या स्वाभाविक नहीं है। आधुनिकता ने बांध तो दे दिया लेकिन मानवता के लिए एक भय भी उपस्थित किया, किन्हीं भी स्थितियों में बांध टूट सकता है, तब क्या होगा। जीवन में कृत्रिमता ने सदैव संकट पैदा किया है। यह आधुनिक भारतीय समाज में दिखाई दे रहा है।

भारतीय चिंतन में समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि परस्पर संबंधों और दायित्वों से जुड़ा हुआ एक जीवंत परिवार है। इसी भावभूमि से वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे विचार विकसित हुए। भारत की सामाजिक संस्कृति की विशेषता रही है कि उसने विविधताओं को समाप्त करने के बजाय उन्हें स्वीकार करते हुए एक व्यापक सांस्कृतिक एकात्मता का निर्माण किया। भाषा, वेशभूषा, खान-पान, पूजा-पद्धति, लोकपरंपरा और सामाजिक रीति-रिवाजों की असंख्य विविधताओं के बावजूद भारतीय समाज को जोड़ने वाली एक सांस्कृतिक चेतना निरंतर प्रवाहित रही है।

समावेशिता का भारतीय अर्थ केवल अधिकारों की समानता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें सह-अस्तित्व, परस्पर सम्मान, कर्तव्य और सहभागिता का भाव भी रहा है। परिवार, ग्राम, तीर्थ, पर्व, मेले और लोकपरंपराएँ सामाजिक समरसता के महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। संत परंपरा ने भी जाति, वर्ग और बाहरी भेदों से ऊपर उठकर मनुष्य की अंतर्निहित गरिमा को प्रतिष्ठित किया।

किन्तु आधुनिकता के साथ आई तीव्र व्यक्तिवादिता, उपभोक्तावाद और बाजार-केंद्रित जीवन-दृष्टि ने इस सामाजिक ताने-बाने को चुनौती दी है। तकनीक ने मनुष्य को जोड़ने के साधन तो बढ़ाए हैं, परंतु अनेक बार वास्तविक संबंधों की आत्मीयता कम हुई है। संयुक्त परिवारों का विघटन, पड़ोस की आत्मीयता में कमी, सामाजिक दायित्वों से बढ़ती दूरी और आभासी जीवन की प्रधानता इसके संकेत हैं। आधुनिकता स्वयं समस्या नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब आधुनिकता अपनी जड़ों और सांस्कृतिक स्मृति से विमुख होकर केवल उपभोग और स्वार्थ का पर्याय बन जाती है।

भारत के लिए आवश्यक है कि वह विज्ञान, तकनीक, समानता और आधुनिक संस्थाओं को अपनाते हुए अपनी समरसता, सह-अस्तित्व और कुटुंब-भावना को भी जीवित रखे। भारतीय आधुनिकता वही होगी जो नए को स्वीकार करे, पर अपनी आत्मा को विस्मृत न करे।

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