माही अग्रवाल
मैं नहीं जानती! क्योंकि, जब से मैं पूरी तरह होश में जी रही हूँ तब से मैं हर पल इस एहसास में हूँ कि जिसे हम जीवन कहते हैं- जीवन अर्थात बचपन से बुढ़ापा नहीं बल्कि जब तक सांसे चल रही हैं तभी तक! किसी भी क्षण अगर सांसो की यह डोर टूट जाए तो कहानी वहीं ख़त्म हो जाएगी……
उसमें आपके या किसी के भी चाहने न चाहने से कुछ नहीं होने वाला….. वजह कोई भी हो लेकिन इस छोटे से जीवन का सामान्य सत्य यही है……
वैसे यह सब मैं कोई बड़ी बात नहीं कह रही हूँ लेकिन फिर भी कह रही हूँ इसलिए कि इन्सान की जो प्रकृति है, उसके हिसाब से जब तक उसके बोध का विस्तार न हो वह खुद तक ही सीमित रहता है….. दूसरों के बारे में उसकी सारी चिंताएं सीखी हुई हैं……
कोई भी अब इतना कुशल हो गया है कि उसे अनुभव के स्तर पर कुछ महसूस हो या न हो लेकिन किस परिस्थिति में कैसा व्यावहारिक नाटक करना है….. इसमें प्रवीण है!
बात गंभीर न हो जाए, इसलिए एक छोटा सा उदाहरण ले लेती हूँ– जैसे जब किसी की मृत्यु हो जाए तो सीखते-सीखते सब सीख गए हैं कि ऐसी परिस्थिति में कैसे व्यवहार करना है?
जैसे दुःख हो या न हो लेकिन थोड़ी दार्शनिक बातें दुखी मन से करनी है! यह अगर कह दें कि जब से मैंने सुना है तब से मुझे भूख ही नहीं लग रही, कुछ भी नहीं खाया जा रहा….. सोच-सोच के हाल बहुत बेहाल है….. ऊपर से उसमें कोई परिवार वाला या पड़ोसी यह जोड़ दे कि कल से तो बस एक टक आसमान की तरफ ही देख रहे थे; जैसे भगवान पहले से ही इन्हें कुछ कहना चाहते हों……. आदि -इत्यादि!
आप सबने ऐसी बहुत सी बातें सुनी-देखी और जानते भी होंगे….. कहीं दूर न जाकर यदि आप अपने ही नाटक पर गौर करने की ठान लिए हैं तो इस समय यह पढ़तें हुए आपके चेहरे पर मुस्कान होगी!
बात वही है, यह जीवन बहुत छोटा है पर चूँकि हमें अंतिम बिंदु या अगले पल के बारे में कुछ भी नहीं मालूम….. और जब से आप पैदा हुए हैं तबसे ऐसे कई पल बीत गए हैं और आपका अस्तित्व अभी भी है…..
तो आपका मन दिमाग से जुगलबन्दी कर यह भ्रम पैदा करने की कला में पारंगत हो चुका है…..कि आपको कुछ नहीं होगा क्योंकि आप अपने स्वास्थ्य का बड़ा खयाल रखते हैं या इसी तरह का आपका अपना कोई भ्रम होगा जिसे आप अनूठा समझते होंगे…….
आप अपने सहज अनुभव से बताइए कि जिसे आप मन कहते हैं वो कहाँ है?
लेकिन किसी ने भी ऐसे किसी भी बिंदु पर न गौर करने की कोशिश की, न ही शायद उसे जरूरत लगी हो!
इसमें आपकी गलती नहीं यह विडम्बना है कि प्रायः सभी इसी संसार में असीम संभावनाओं के साथ आते हैं और पूरा जीवन तुच्छता में बर्बाद कर चले जाते हैं…… उसमें एक बड़ा कारण बहुतों का यह आलस भी है!
खैर, मन क्या है? या ऐसी और भी बातें सोचने के लिए आप सभी को अगली मुलाकात तक का वक़्त दे देती हूँ ताकि आप अपनी सहभागिता दिखाएँ तो मुझे आपसे संवाद करने में थोड़ी और ख़ुशी होगी……
नहीं तो मैं मात्र आपके मनोरंजन का साधन बन के रह जाऊं ये मुझे गँवारा नहीं…..
लाभ तो इसी में है कि मैं आपसे संवाद की मुद्रा में हूँ….. आप अपनी जिज्ञासा प्रकट करें या किसी भी रूप में हमारी इस यात्रा में सहयोगी होना चाहें तो स्वागत………..
चलिए अब संवाद की दिशा को थोड़ा सा मोड़ देती हूँ और आपको नैतिकता के प्रश्नों पर ले आती हूँ…..
नैतिकता की बात इसलिए भी यहाँ ले आई हूँ…. उसकी एक वजह तो इनबॉक्स में परेशान होना भी है….. शायद कुछ लोगों की आदत ही ऐसी होती है जैसे वो हर जगह बस शिकार पर निकलते हों….. चूँकि पुरुष होने में पुरुषत्व इतना हावी होता है कि इसके आवेश में वे उम्र और रिश्तों की मर्यादा से भी परे निकल जाते हैं…….
मैं यहाँ किसी को दोष नहीं दे रही, जो भी हैं वो ऐसा अपने मन की वजह से ही करते हैं….. उनका मन ऐसा करने को कहता है……. इस संसार में जो भी उपद्रव या कुछ अच्छा हो रहा है….. उसमें भी मन का बड़ा हाथ है!
हर अपराधी जिस भी किस्म के अपराध में लिप्त है वह अपने मन के कारण ही है….. अब यह मत कहिएगा कि अपराधी विवश होता है…… गरीबी या राजनीति जैसी कई बातों को ढाल बना के कहें कि यही वह बड़ी वजह है…..
तो ये बातें सत्य नहीं हैं! अपराध जगत में उतरने वाला कोई भी अपराधी यदि गरीब भी है तो पैसे आ जाने के बाद साधु नहीं हो जाता! वो फिर भी अपराध करता है क्योंकि उसे अब इस खेल में मजा आने लगा है और ये मजा ले कौन रहा है, वही उस व्यक्ति का मन!
ऐसे ही कई हैं जो उम्र में शायद दादा जी के हों या किसी भी उम्र के, पर अपने परिवार को छोड़ बाकी उनकी पसंद की कोई भी लड़की हो उसे वो किसी भी रूप में कल्पित कर वैसे ही उसका आनंद लेने लगते हैं….. अब चूँकि कोई भी आनंद स्थाई नहीं है वो क्षणिक है….. उसका समाप्त होना तय है, तो जैसे ही वह समाप्त होने लगता है उनका मन उनके बुद्धि को आदेश दे उनसे जो चाहे करवाता है……
इसमें वो यह भूल जाते हैं कि महज अपने आनंद के लिए वो जो भी हरकतें कर रहे हैं उससे कोई आहत भी तो होता ही होगा!
कम्बख्त क्या बताऊँ यहाँ जो आहत हुआ वो भी मन ही है! अगर तन आहत होता तो कोई एक्शन ले लेती….. चूँकि मन आहत होने को मुझसे आज्ञा माँगने लगता है तो उसे यह कहकर रोक देती हूँ कि चिल यार….. किसी पोस्ट के बीच जब नागिन डांस की नौबत आई तो तेरी बात जनता तक पहुँचा जरुर दूंगी बाकी लोग माने या न माने यह उनकी मर्जी….. आखिर उनके मन का मैं क्या कर सकती हूँ……
और यह संसार रहने लायक है या यहाँ जीवन सुरक्षित बना हुआ है उसकी भी एक बड़ी वजह यही है कि शत-प्रतिशत किसी के मन का नहीं हो रहा है……
चीन और उत्तर कोरिया के साम्राज्यवादी और तानाशाह भी यूँ ही परेशान नहीं है….. उनके भी मन का नहीं हो रहा है…….
खैर, बातों-बातों में अपनी बहुत सारी बातें कह गई, साथ ही आपको मन का परिचय भी दे दिया…….
अब बात जो ऊपर छोड़ दी थी- नैतिकता…..
कुछ उस पर भी चर्चा हो जाए! क्या कहते हैं आप…… न भी कहते हों तब ये गाड़ी ऐवें चलेगी क्योंकि ड्राईवर तो मैं हूँ न….. हाँ अब जिनमें उर्जा न बची हो वो यहीं ठहर सकते हैं पर जनाब अगर आप ठहर गए तो आगे हरियाली है, प्रकृति है और मन और नैतिकता की एक जटिल स्थिति जिससे आप चूक सकते हैं……
वैसे, संक्षेप में नैतिकता को समझाना आसान तो है नहीं….. नैतिकता अपने आप में एक सापेक्ष अवधारणा हैं! इसको एक निश्चित परिभाषा में बांध दूँ तो यह नैतिकता के साथ धोखाधड़ी हो जाएगी….. और किसी को धोखा देने की न मेरी आदत है और न कोई माकूल वजह!
चलिए नैतिकता पर बात करते हुए आपको एक नैतिक सिचुएशन में ले चलती हूँ…. उसके लिए यहाँ एक ऐसे घटनाक्रम का वर्णन कर रही हूँ…. जहाँ एक ऐसा मानवीय मूल्य है जिसके समक्ष पुरानी नैतिक अवधारणा बौनी नज़र आ सकती है……
आपको उस सिचुएशन में ले जाने के लिए मैंने एक पेंटिंग और एक बहुत प्रसिद्द यूरोपीय कहानी का सहारा लिया है…….
शायद आप यूरोप के बहुत प्रसिद्ध कलाकार बारतोलोमिओ एस्तेबन मुरिलो की इस इस पेंटिंग के बारे में आप पहले से अवगत हों! यदि आप नहीं जानते हैं तो आपकी सुविधा के लिए मैं बता देती हूँ कि— यह एक “बाप और बेटी” को दर्शाता चित्र है!
हो सकता है आपमें से कई लोग यहाँ बिचक कर किसी छद्म नैतिक शब्दावली का सहारा ले कर बचाव करने लगे या इसे अश्लील मान कर आपका मन घृणा और अवसाद से भर जाए……
लेकिन मुझे पूरा यकीन है जब आप इस प्रसिद्ध पेटिंग के पीछे छिपी कहानी को सुनेंगे तो आपके विचार जरूर बदलेंगे, आपकी नैतिक अवधारणा जरुर करवट लेगी—–
“एक बूढ़े आदमी को मृत्यु तक भूखा रहने की सजा दी गई! उसकी एक बेटी थी जिसने दंडनायकों से अपने सजायाफ्ता पिता से रोज मिलने का अनुरोध किया जो मान ली गई!
जब भी वह लड़की अपने पिता से मिलने जाती, मुलाकात के समय लड़की की बड़ी अच्छी तरह तलाशी ली जाती थी कि कहीं अपने पिता के लिए खाने पीने का कोई भी सामान आदि न ले जा सके……
भूख के कारण प्रतिदिन निढाल होते हुए पिता के शरीर को मौत के करीब जाते देखकर लड़की दुख और बेबसी से बहुत उदास और दुखी थी!
उससे अपने पिता की हालत देखी नहीं जा रही थी तो उसने अपने पिता को बचाने के लिए या जब तक वह उन्हें जीवित रख सकती थी, तब तक जीवित रखने की ठानी!
और एक ऐसी हरकत की, जो कई लोगों के लिए पाप के बराबर थी और दूसरों के लिए प्यार और स्नेह की एक अनूठी मिसाल थी!
चूँकि, प्रतिबंध के कारण लड़की अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकती थी, तो उसने मजबूर होकर अपने मर रहे पिता को को कुछ और जीवन देने के लिए अपना स्तनपान कराना शुरू कर दिया……
जिससे पिता की हालत बेहतर होने लगी….. जिसमें उसने अपार हर्ष का अनुभव किया….. वह कृतज्ञता से भर गई…… एक बार फिर यहाँ एक वृद्ध व्यक्ति पुत्र हो चला था और बेटी ने स्त्रीत्व में ममत्व का अनुभव कर अपनी पूर्णता साकार कर ली थी……
चूँकि, ख़ुशी भी क्षणिक है तो यहाँ भी नहीं टिकी, एक दिन पहरेदारों ने उसे ऐसा करते हुए पकड़ लिया और उस समय के शासक के सामने पेश कर दिया……
इस अनोखी घटना ने समाज में खलबली मचा दी और लोग दो गुटों में बंट गए, एक धड़ा उसे पिता के पवित्र रिश्ते का हनन करने के साथ निंदनीय अपराध समझ रहा था तो दूसरा उसे बेटी और पिता के रिश्ते, प्यार और स्नेह की महान भावना की मिसाल के तौर पर पेश कर रहा था……
इस अजीब घटना ने स्पेन और यूरोप में ईश्वरीय सत्ता व पवित्रता और मानव मूल्यों व प्यार के बीच एक नई बहस छेड़ दी थी…… इस अनोखी घटना को यूरोप के कई पेंटरो ने कैनवास पर उतारा, जिसमें मुरिलो की ये पेंटिंग बहुत मशहूर हुई…….
इस मामले ने उस समय बहुत तूल पकड़ा और अंततः मानवीय मूल्यों की जीत हुई और दोनों बाप-बेटी को रिहा कर दिया गया……”
तो देखा आपने, पहली नजर में जो चित्र आपको अश्लील लगी और आपका मन कई ऐसी भावों से भर गया जो उस चित्र में नहीं थे बल्कि आपके मन में कहीं गहरे छिपे थे…..
लेकिन सन्दर्भ जानते ही इसी चित्र के प्रति आपके भाव अब बदल गए होंगे और आपकी नैतिकता की अवधारणा भी….. साथ ही एक छोटी सी झलक इस बात की भी कि सूचनाओं का असर आपके मन पर कितना गहरा होता है और ये सभी सूचनाएं आपकी बुद्धि के संरक्षण में हैं!
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