जी-20 में जयशंकर का कूटनीतिक संदेश और वैश्विक नेतृत्व की नई दिशा

बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की विदेश नीति

पूनम शर्मा

विश्व राजनीति आज एक ऐसे निर्णायक दौर से गुजर रही है, जहाँ सैन्य शक्ति का प्रदर्शन बढ़ रहा है, लेकिन स्थायी शांति की संभावनाएँ लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, अमेरिका-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार में संरक्षणवादी प्रवृत्तियाँ अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नई दिशा दे रही हैं। ऐसे समय में जी-20 के मंच पर भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देने का संदेश केवल एक औपचारिक राजनयिक वक्तव्य नहीं, बल्कि भारत की विकसित होती विदेश नीति और बदलती वैश्विक भूमिका को समझने का अवसर भी है।

आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विश्व की महाशक्तियाँ सैन्य टकराव के माध्यम से स्थायी समाधान खोज सकती हैं, अथवा अंतरराष्ट्रीय संबंधों को फिर से संवाद, विश्वास और पारस्परिक सम्मान की बुनियाद पर खड़ा करना होगा?

भारत का दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना परस्पर विरोधी उद्देश्य नहीं हैं।

सैन्य शक्ति की सीमाएँ और कूटनीति की अनिवार्यता

पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं ने यह प्रदर्शित किया है कि आधुनिक युद्ध केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहते। उनका प्रभाव ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश, परिवहन और सामान्य नागरिकों के जीवन तक पहुँचता है।

रूस-यूक्रेन संघर्ष ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है, जबकि पश्चिम एशिया में तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की संवेदनशीलता को उजागर किया है। इन संघर्षों से विकासशील देशों को भी आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है, भले ही वे प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल न हों।

ऐसी परिस्थितियों में भारत का कूटनीतिक संदेश महत्वपूर्ण है। सैन्य क्षमता किसी भी संप्रभु राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक है, लेकिन केवल सैन्य शक्ति के आधार पर दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान संभव नहीं होता।

कूटनीति की वास्तविक सफलता विरोधी पक्षों के बीच संवाद के रास्ते खुले रखने, संघर्ष को सीमित करने और ऐसे समझौते विकसित करने में निहित है जो स्थायी शांति का आधार बन सकें।

रणनीतिक स्वायत्तता: भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी शक्ति

स्वतंत्रता के बाद से भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आधार स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता रही है। शीतयुद्ध के दौरान गुटनिरपेक्षता और वर्तमान समय में रणनीतिक स्वायत्तता इसी व्यापक सोच के अलग-अलग स्वरूप हैं।

आज भारत अमेरिका के साथ रक्षा, प्रौद्योगिकी और आर्थिक सहयोग बढ़ा रहा है, तो रूस के साथ अपने ऐतिहासिक रणनीतिक संबंध भी बनाए हुए है। यूरोपीय संघ, जापान, आसियान, खाड़ी देशों और अफ्रीकी राष्ट्रों के साथ भारत की साझेदारी लगातार विविध क्षेत्रों में विकसित हुई है।

यह बहुआयामी कूटनीति किसी एक शक्ति केंद्र पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न देशों के साथ साझा हितों के आधार पर संबंध विकसित करने का प्रयास है।

हालाँकि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ केवल किसी गुट में शामिल न होना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है कि भारत प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी सुरक्षा, आर्थिक आवश्यकताओं, दीर्घकालिक हितों और सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र निर्णय ले सके।

यह स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी, क्योंकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ प्रमुख शक्तियाँ अपने साझेदार देशों से अधिक स्पष्ट राजनीतिक समर्थन की अपेक्षा करती हैं।

ग्लोबल साउथ की आवाज बनता भारत

जी-20 में जयशंकर ने समुद्री व्यापार मार्गों पर हमलों और आपूर्ति शृंखलाओं के राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल पर भी चिंता जताई। उन्होंने रेखांकित किया कि समुद्री परिवहन में बाधाओं का सबसे अधिक नुकसान विकासशील देशों को उठाना पड़ता है, क्योंकि इससे ईंधन, खाद्यान्न और उर्वरकों की उपलब्धता तथा कीमतें प्रभावित होती हैं।

यहाँ भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आयाम सामने आता है। भारत केवल अपनी आर्थिक सुरक्षा की बात नहीं कर रहा, बल्कि उन देशों की चिंताओं को भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थान देने का प्रयास कर रहा है, जिनकी वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अपेक्षाकृत सीमित भागीदारी है।

अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के लिए आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और औद्योगिक विकास किसी भी सामरिक प्रतिस्पर्धा से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।

भारत के सामने अवसर है कि वह इन देशों के साथ विकास सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण और न्यायसंगत व्यापार व्यवस्था के माध्यम से अपनी साझेदारी को और मजबूत करे।

आतंकवाद पर दोहरे मानदंड स्वीकार्य नहीं

जयशंकर के संबोधन का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष आतंकवाद था। उन्होंने चेतावनी दी कि अल्पकालिक रणनीतिक हितों के कारण आतंकवाद के खतरों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद की चुनौती का सामना करता रहा है। इसलिए आतंकवाद के प्रश्न पर उसकी कूटनीतिक प्राथमिकताएँ राष्ट्रीय सुरक्षा के अनुभवों से जुड़ी हुई हैं।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी आवश्यक है कि आतंकवाद के प्रति उसका दृष्टिकोण किसी देश की राजनीतिक उपयोगिता या रणनीतिक स्थिति के आधार पर न बदले।

आतंकवाद के विरुद्ध प्रभावी सहयोग तभी संभव है, जब सभी देशों के लिए समान मानदंड अपनाए जाएँ और हिंसक गतिविधियों को समर्थन देने वाले नेटवर्क के विरुद्ध विश्वसनीय कार्रवाई सुनिश्चित हो।

बहुध्रुवीय विश्व में भारत के लिए अवसर और चुनौतियाँ

बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका केवल महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाने तक सीमित नहीं रह सकती। भारत को वैश्विक आर्थिक नियमों, तकनीकी मानकों, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संस्थागत सुधारों पर भी प्रभावी पहल करनी होगी।

जी-20 जैसे मंचों पर सहमति बनाना कठिन होता जा रहा है। अटलांटा बैठक में प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद इस चुनौती का उदाहरण हैं

ऐसी स्थिति में भारत के लिए कूटनीतिक सफलता का अर्थ केवल प्रभावशाली वक्तव्य देना नहीं, बल्कि साझा हितों के आधार पर ठोस सहयोग विकसित करना होगा।

भारत को अपनी आर्थिक क्षमता, रक्षा तैयारियों, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करते हुए अंतरराष्ट्रीय विवादों में संवाद का समर्थन जारी रखना चाहिए।

निष्कर्ष: भारत को केवल सहभागी नहीं, समाधान का सूत्रधार बनना होगा

जी-20 में जयशंकर का संदेश भारत की विदेश नीति के सामने उपस्थित व्यापक अवसर को रेखांकित करता है। आज विश्व को ऐसे देशों की आवश्यकता है जो राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संवाद के रास्ते बंद न होने दें।

भारत की सभ्यतागत परंपरा में सहअस्तित्व और संवाद को महत्व दिया गया है। लेकिन आधुनिक विश्व में इन आदर्शों की प्रासंगिकता तभी सिद्ध होगी, जब उन्हें व्यावहारिक कूटनीति, आर्थिक शक्ति और विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आधार बनाया जाए।

भारत की वास्तविक कूटनीतिक सफलता इस बात में होगी कि वह वैश्विक संघर्षों के बीच केवल शांति की अपील करने वाला देश न रहे, बल्कि समाधान खोजने की प्रक्रिया में सक्रिय और विश्वसनीय भागीदार बने।

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