नयी दिल्ली: अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, व्याख्यानमाला सम्पन्न
"नामूलं लिख्यते किञ्चित" व्याख्यानमाला के अंतर्गत “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषयक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन हुआ।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,6 जून: केशवकुंज, झंडेवालाँ, नयी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के केन्द्रीय कार्यालय में भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति, दिल्ली प्रान्त एवं माधव संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “नामूलं लिख्यते किञ्चित” व्याख्यानमाला के अंतर्गत “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” विषयक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन हुआ। 
आज के इस व्याख्यानमाला के मुख्य वक्ता के रूप में आचार्य (डॉ.) रजनीश कुमार शुक्ल जी (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना) ने मुख्य विषय “भारत की विविध योग परंपरा का इतिहास” पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। प्रोफेसर शुक्ल जी ने कहा कि भारत की योग परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और विविध है-इसकी जड़ें सिंधु-सरस्वती सभ्यता (2700 ईसा पूर्व) तक जाती हैं, और समय के साथ यह वेदों, उपनिषदों, महाभारत, भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र, हठयोग, भक्ति योग और आधुनिक योग दिवस तक विकसित हुई हैं। आज योग भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रतीक बन चुका है। उन्होंने कहा कि योग की आंतरिक शुद्धता, शुचिता व्यक्तिगत नहीं होती बल्कि समष्टिगत होती है।
व्याख्यानमाला में जिनका सान्निध्य मिला ऐसे, आदरणीय डॉ. बालमुकुन्द पाण्डेय जी (राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना) ने अपने पाथेय उद्बोधन में कहा कि दर्शन का क्रिया रूप योग है, योग उस दर्शन का व्यावहारिक रूप है। जहाँ दर्शन विचार देता है, वहीं योग उसे जीवन में उतारने की साधना है। दर्शन कहता है कि आत्मा शुद्ध है और परमात्मा से जुड़ सकती है। योग इस सत्य को अनुभव कराने का साधन है-ध्यान, प्राणायाम, आसन और आत्मनियंत्रण के माध्यम से। इसलिए कहा जाता है कि योग दर्शन का क्रियात्मक पक्ष है। दर्शन हमें मार्ग दिखाता है, और योग उस मार्ग पर चलने की साधना है।
व्याख्यानमाला की अध्यक्षता प्रो. बुद्ध रश्मि मणि (पद्मश्री) ( सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद, इतिहासकार, कला समीक्षक, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, ABISY) ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि योग का उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा को परमात्मा से जोड़ना है। शरीर और मन का जुड़ाव, आसन और प्राणायाम के माध्यम से शरीर और मन में संतुलन स्थापित होता है। योग केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी माध्यम है। इसलिए योग को केवल व्यायाम या आसन तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका गहरा अर्थ है-जुड़ाव और एकत्व। योग हमें स्वयं से, समाज से और परम सत्य से जोड़ता है।
कार्यक्रम डॉ. पीयूष मिश्र के मंगलाचरण के साथ आरंभ हुआ। व्याख्यानमाला का संचालन डॉ. सौरभ कुमार मिश्र (उप निदेशक, ICHR, राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख ABISY) जी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संजीव कुमार मिश्र जी (स्नातकोत्तर शिक्षक, कार्यकारिणी सदस्य, दिल्ली प्रान्त) ने किया।
दिल्ली प्रान्त महासचिव डॉ. निर्मल पाण्डेय के नेतृत्व-समन्वयन-संयोजन में प्रान्तीय टीम ने आज के कार्यक्रम का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
इस अवसर पर प्रो. सुस्मिता पाण्डे(प्रमुख, CHB, सदस्य ICHR, ICPR, Ex-CP एनएमए, प्रमुख, महिला इतिहासकार परिषद, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नयी दिल्ली), सुरेन्द्र हंस, श्री विधु पाण्डे, डॉ. नरेंद्र शुक्ल (प्रमुख, शोध एवं प्रकाशन विभाग, PMML, पूर्व परियोजना समन्वयक-CHB, लेखक परिषद, ABISY), प्रान्त संरक्षक सदस्य प्रो. रमेश कुमार मिश्र, शत्रुजीत सिंह , प्रो. धर्मचंद चौबे (अध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त), प्रो. प्रवीन गर्ग (प्राचार्य स्वामी श्रद्धानन्द कॉलेज, कार्यकारी अध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त), प्रो. अखिलेश कुमार दुबे (उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त ), प्रो. युथिका मिश्र (उपाध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त), डॉ. अजय जी (संगठन मंत्री, दिल्ली प्रान्त), डॉ. अस्मित शर्मा (कार्यालय प्रमुख, दिल्ली प्रान्त) , श्री सचिन झा (कोषाध्यक्ष, दिल्ली प्रान्त), मुकेश उपाध्याय (राष्ट्रीय कार्यालय प्रमुख, ABISY ), कुमार राकेश, डॉ. सत्य प्रकाश, डॉ. रमाकांत, डॉ. कौशलेंद्र, डॉ. प्रीति उपाध्याय, डॉ. रचना, डॉ. ज्योति शुक्ला, आकाश नारायण, आदित्य कुमार, कृष्णा द्विवेदी, आयुष द्विवेदी, पंकज, मानस गुप्ता सहित अनेकानेक दायित्वधारी, पदाधिकारीगण, आजीवन सदस्य और विभिन्न विश्वविद्यालय के प्राध्यापक गण डेढ़ सौ से ज़्यादा की संख्या में शिक्षक-शोधार्थी-विद्यार्थी प्रतिभागी रूप में उपस्थित रहे।
बमबम यादव
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