त्रिभाषीय शिक्षा और ‘औपनिवेशिक शिक्षा’ मानसिकता से ग्रसित माँ-बाप ?

पूनम शर्मा
मातृभाषा बनाम औपनिवेशिक मानसिकता
हाल ही में CBSE की कक्षा 9 के लिए लागू तीन-भाषा नीति ने एक चर्चा को तेज कर दिया है। इस नीति के तहत छात्रों को तीन भाषाएँ पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएँ अनिवार्य हैं। इसका उद्देश्य मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को मजबूत करना है, लेकिन इसका सबसे बड़ा विरोध , लेकिन इसका सबसे बड़ा विरोध समाज की मानसिकता से सामने आ रहा है ।

ऐतिहासिक संदर्भ: भाषा और शिक्षा का भारतीय परिप्रेक्ष्य

अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥

प्रतिदिन धन की प्राप्ति (आय का साधन), सदा निरोगी रहना, प्रिय बोलने वाली अनुकूल पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र और धन कमाने वाली (अर्थकारी ) विद्या—ये छह चीजें इस संसार में मनुष्य के लिए सुखदायक होती हैं।

भारत को सोने की चिड़िया ऐसे ही नहीं कहा गया। भारत की शिक्षा व्यवस्था में अर्थ अथवा धन कमाने के उद्देश्य को सर्वोपरि रखा गया था । ऐसा नहीं है कि यदि आप संस्कृत पढ़ते थे या अपनी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करते थे तो आप धन नहीं कमा सकते थे। ब्रिटिश शासन से पहले भारत में भाषा की स्थिति सुलभ सरल और बहुभाषी थी। फारसी, जो तुर्को-फारसी और अफगान साम्राज्यों के साथ आई, दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य और प्रारंभिक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक भाषा थी। संस्कृत, दार्शनिक और साहित्यिक एवं  शिक्षा की भाषा थी, जबकि क्षेत्रीय भाषाएँ जैसे तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली, पंजाबी आदि अपने-अपने शिक्षा क्षेत्रों में  शिक्षा के लिए भी प्रचलित थीं। क्षेत्रीय भाषाएँ अपने-अपने क्षेत्रों में शिक्षा समाज और संस्कृति की पहचान थीं और भाषा एवं शैक्षणिक मामलों पर कभी भी कोई मतभेद नहीं था । बच्चों की शिक्षा को लेकर भारत के इतिहास में कोई भी मतभेद अथवा विवाद कहीं भी वर्णित नहीं है ।
लेकिन 1837 में अंग्रेजों ने फारसी की जगह अंग्रेजी को प्रशासनिक भाषा बना दिया। इसके बाद धीरे-धीरे भारतीय शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह औपनिवेशिक ढांचे में ढल गई। । इसके साथ ही, पारंपरिक शिक्षा संस्थान जैसे पाठशाला और गुरुकुलों को जान बूझ कर समाप्त किया क्योंकि किसी उपनिवेश को स्थापित करना अर्थात सबसे पहले लक्ष्य शिक्षा को अपने अनुसार बना लेना  यह कार्य फ्रेंच उपनिवेशकों द्वारा  वियतनाम में भी किया गया था । पाठशाला और गुरुकुल जैसे संस्थान केवल शिक्षा के केंद्र ही नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के अहम हिस्से थे।ऐसी उच्च कोटि की व्यवस्था जिससे एक सुदृढ़ और स्वस्थ समाज की नींव रखी जा सकती उसे ब्रिटिश ने खत्म कर दिया था उसे अवैध बना दिया । फलस्वरूप शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान से अधिक नौकरी और प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित होकर रह गया।
तीन भाषाएँ भारत में हमेशा से थी तब किसी अभिभावक को यह अनुभव नहीं हुआ कि उनके बच्चों को तीन भाषाओं का बोझ होगा एवं समाज के एकांश लोग इन तीनों भाषाओं को जानते थे क्योंकि यह उनके कार्यक्षेत्रों में प्रयुक्त होती थीं ।

औपनिवेशिक मानसिकता आज भी क्यों कायम है?

आजादी के दशकों बाद भी भारत के लोग पूरी तरह औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं । आज भी बड़ी संख्या में लोग अंग्रेजी को ही सफलता, नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा का माध्यम मानते हैं।आज की शिक्षा प्रणाली कई बार रटने और डिग्री प्राप्त करने तक सीमित हो गई है। कई लोगों के लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल सरकारी नौकरी और आरामदायक जीवन बनकर रह गया है।
अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को बचपन से केवल अंग्रेजी और विदेशी भाषाएँ सिखाने में गर्व महसूस करते हैं, लेकिन अपनी मातृभाषा बोलने या सिखाने में संकोच करते हैं। यह केवल भाषा का सवाल नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान के सम्मान का भी प्रश्न है।अपने देश प्रेम एवं अपने आत्मसम्मान का भी प्रश्न है ।
आज कई परिवारों में बच्चे अपनी मातृभाषा ठीक से पढ़ या लिख नहीं पाते। घरों में अंग्रेजी बोलने पर जोर दिया जाता है और फिर वही लोग सरकार की भाषा नीति का विरोध भी करते हैं। चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी में उच्च शिक्षा ग्रहण कर विदेशों में चले जाएं । सवाल यह है कि अपनी मातृभाषा सीखने में समस्या क्या है?
क्या अपनी भाषा सीखना गलत है?
अगर जापान, चीन, रूस, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश अपनी भाषा में शिक्षा देकर विश्व शक्तियाँ बन सकते हैं, तो भारत में अपनी भाषाओं को लेकर हीन भावना क्यों है?
अंग्रेजी सीखना गलत नहीं है, लेकिन अपनी भाषा को छोड़ देना निश्चित रूप से चिंताजनक है। यदि कोई समाज अपनी ही भाषा का सम्मान नहीं करेगा, तो वह धीरे-धीरे अपनी जड़ों और संस्कृति से कट जाएगा। और ऐसा समाज किसी के प्रति भी ईमानदार नहीं हो सकता । सरकार को हर बार भाषा सुधार वापस लेने के लिए मजबूर करना समाधान नहीं है। यदि लोग स्वयं अपनी भाषाओं को महत्व नहीं देंगे, तो कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती।

तीन-भाषा नीति का वास्तविक उद्देश्य

तीन-भाषा नीति का उद्देश्य किसी पर भाषा थोपना नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को बचाना और छात्रों को बहुभाषी बनाना है।और ऐसी ही व्यवस्था हमेशा से थी । एक प्रशासनिक भाषा जो प्राचीन भारत में थी एवं प्रांतीय भाषा एवं बोलियाँ जो पूरे समाज को जोड़ती थीं । नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में आज भी कर्नाटक से पुजारी आते हैं यही परंपरा है, यह तब की बात है जब नेपाल भी भारत का अंश था । तो क्या यहाँ भाषा एक विवाद है ? कदापि नहीं ।
प्राचीन भारत में लोग एक साथ कई भाषाएँ जानते थे — संस्कृत, फारसी, प्राकृत पालि और क्षेत्रीय भाषाएँ — और यही भारत की सांस्कृतिक ताकत थी। आज के समय में भारतीय भाषाओं का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है इसमें  कोई मतभेद नहीं होना चाहिए । जब आप अन्य भाषा पढ़ते हैं तो उस समाज के प्रांत के साहित्य एवं जीवन शैली के विषय में जानते हैं । एक बात हो सकती है भाषा का जो पाठ्यक्रम है उसे सरल बनाया जाए ज्यादा कठिन न हो । यह नीति भारतीय भाषाओं को शिक्षा और समाज में फिर से मजबूत स्थान देने का प्रयास है।

मातृभाषा में शिक्षा क्यों जरूरी है?

दुनिया भर में यह माना गया है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में बेहतर सीखते हैं। जब शिक्षा अपनी भाषा में होती है, तो बच्चों की समझ, रचनात्मकता और आत्मविश्वास बढ़ता है।
भारत में मेडिकल, इंजीनियरिंग, MBA और अन्य उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों को हिंदी और क्षेत्रीय languages में उपलब्ध कराना समय की आवश्यकता है। इससे शिक्षा केवल अंग्रेजी जानने वाले सीमित वर्ग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समाज के हर वर्ग तक पहुंचेगी।एक बात अवश्य है कि उच्च शिक्षा के लिए जो भी किताबें हैं वे मातृभाषा में लिखी जाएं इंजीनिरिंग और मेडिकल एवं जो भी शिक्षा एवं प्रशिक्षिण से संबधित हों ।

शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता

आज की शिक्षा प्रणाली कई बार रटने और डिग्री प्राप्त करने तक सीमित हो गई है। कई लोगों के लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल सरकारी नौकरी और आरामदायक जीवन बनकर रह गया है।
जरूरत इस बात की है कि शिक्षा को व्यावहारिक, सरल और समाज से जुड़ा बनाया जाए। क्षेत्रीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई जाए और पाठ्यक्रम स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किए जाएँ।

समाज की मानसिकता बदलना सबसे जरूरी

तीन-भाषा नीति की सफलता केवल कानून बनाने से नहीं होगी। इसके लिए समाज की सोच बदलनी होगी।
जब तक लोग अंग्रेजी को “श्रेष्ठ” और अपनी भाषा को “कमतर” मानते रहेंगे, तब तक कोई भी शिक्षा सुधार अधूरा रहेगा। भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जो आधुनिक भी हो और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी भी हो। आधुनिकता पश्चिमीकरण होना नहीं है । मॉडर्न होना किसी विदेशी सभ्यता का अनुकरण नहीं है ।

माता पिता की असफलता

यदि भारत के माता पिता अपने बच्चों को अपनी भाषा और संस्कृति से दूर कर रहे हैं तो यह उनके देशविरोधी चरित्र का परिचायक है इसमें बच्चों का कोई दोष नहीं हो सकता यह बहुत आवश्यक है कि देश हित में हम भारत की शिक्षा नीति में सुधार के लिए अपने प्रयास करें, अपने समाज को ,अपने बच्चों को राष्ट्रीयता सिखाएं सरकार के हाथ सुदृढ़ करें ।अपने पैरों पर खड़े हों अपनी भाषा के समर्थन में अंग्रेजी के स्थान पर अपनी भाषा को स्थापित करें । विरोध करने के स्थान पर सरकार का साथ दें । अपने देश की समस्याओं को समझते हुए चुनौतियों के विषय में जानें और सहयोग करें ना कि अदालतों में जाकर समय नष्ट करें । भारत की अदालतों को ऐसे मामलों को भी लेना ही नहीं चाहिए । यह कोई विवाद का मुद्दा हो ही नहीं सकता ।

निष्कर्ष

समय आ गया है कि भारत अपने इतिहास से सीखे और यह समझे कि भाषा केवल संवाद का माध्यम ही नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और आत्मसम्मान की नींव है।
अंग्रेजी सीखना आवश्यक नहीं हो सकता है, अपनी मातृभाषा को भूल जाना प्रगति नहीं, बल्कि हमारी देश एयर मतरभूमि से विश्वास घात है यह हमारी कमजोरी का संकेत है।
भारत तभी वास्तविक रूप से आत्मनिर्भर और ज्ञानवान राष्ट्र बन सकेगा, जब वह अपनी भाषाओं, अपनी संस्कृति और अपनी शिक्षा व्यवस्था पर गर्व करना सीखेगा।

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