बाल विवाह के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित

भारत की मुहिम और जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के प्रयासों को मिली बड़ी वैश्विक सफलता, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव को दी मंजूरी।

  • संयुक्त राष्ट्र ने भारत की मुहिम पर मुहर लगाते हुए हर साल 27 नवंबर को ‘बाल विवाह के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस’ घोषित किया है।
  • जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (JRC) के संस्थापक भुवन ऋभु की पहल पर सिएरा लियोन ने 67 देशों के समर्थन के साथ यूएन में यह प्रस्ताव पेश किया था।
  • भारत में ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ अभियान और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार देश में बाल विवाह की दरों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 8 सितंबर: बाल विवाह के खिलाफ चल रही वैश्विक और राष्ट्रीय लड़ाई को एक ऐतिहासिक सफलता मिली है। संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर 27 नवंबर को ‘बाल विवाह, कम उम्र और जबरन विवाह के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस’ के रूप में घोषित कर दिया है। भारत के दृष्टिकोण से इस तारीख का विशेष ऐतिहासिक महत्व है, क्योंकि 27 नवंबर 2024 को ही भारत सरकार ने ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ अभियान की राष्ट्रव्यापी शुरुआत की थी। इस घोषणा के बाद से देश और दुनिया भर के बाल अधिकार कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह का माहौल है। यह मील का पत्थर इस बात का प्रतीक है कि अब इस सामाजिक अभिशाप को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए वैश्विक समुदाय एकजुट होकर काम कर रहा है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की पहल और वैश्विक समर्थन

इस ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय दिवस को घोषित कराने में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (JRC) के संस्थापक भुवन ऋभु की पहल ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई। मार्च 2026 में संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने दुनिया भर के नेताओं के सामने इस समर्पित दिवस को मनाने का प्रस्ताव रखा था। अफ्रीकी देश सिएरा लियोन की फर्स्ट लेडी डॉ. फातिमा मादा बायो ने इस विजन का पुरजोर समर्थन किया और भारत सहित 67 देशों के अनुमोदन वाले इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्तुत किया। आखिरकार 4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र ने इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से पारित कर दिया। इस दौरान यूएन में जेआरसी के संस्थापक भुवन ऋभु नागरिक समाज संगठनों की तरफ से एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मौजूद रहे।

भारत में बाल विवाह के आंकड़ों में आई गिरावट

हाल ही में जारी आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ों पर नजर डालें तो इस प्रकार के अभियानों का जमीनी असर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 (2019-21) के अनुसार देश में 23.3 फीसदी लड़कियों की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले हो जाती थी, जो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-6 (2023-24) में घटकर 20.1 फीसदी पर आ गई है। सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों के अथक प्रयासों के कारण उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यह आंकड़ा और तेजी से नीचे गिरेगा। सतत विकास लक्ष्य 5 (लैंगिक समानता) के तहत वर्ष 2030 तक दुनिया भर से बाल विवाह जैसी हानिकारक प्रथाओं को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके अनुरूप भारत और अन्य देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

सीमाओं से परे फैला ‘बाल विवाह मुक्त’ अभियान

भारत से शुरू हुई यह मुहिम अब केवल देश तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के 99 से अधिक देशों तक अपनी पहुंच बना चुकी है। दिसंबर 2024 में ‘बाल विवाह मुक्त नेपाल’ अभियान की शुरुआत हुई और देखते ही देखते यह वैश्विक आंदोलन बन गया। जेआरसी के नेतृत्व में चलाए गए 100 दिवसीय विशेष अभियानों के माध्यम से दुनिया भर की सरकारों और एक लाख से अधिक स्कूलों तक इस संदेश को पहुंचाया गया है। भारत में भी इस नेटवर्क के माध्यम से 782 जिलों में पंचायतों, धर्मगुरुओं, पुलिस और स्थानीय नागरिकों के सहयोग से पांच लाख से अधिक बाल विवाहों को रोका गया है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जब सरकार, नागरिक समाज और समुदाय मिलकर प्रयास करते हैं, तो समाज में बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं।

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