इतिहास केवल अतीत नहीं, राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा है: डॉ. बालमुकुंद पांडे

अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना काशी प्रांत द्वारा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें इतिहास के अध्ययन और अनुसंधान पर गहन चर्चा हुई।

  • इतिहास और राष्ट्रीय चेतना: इतिहास का मुख्य उद्देश्य राष्ट्र-निर्माण की चेतना को उन्नत करना और युवाओं को सकारात्मक दिशा देना है।
  • शांतिपूर्ण जनांदोलन: भारत का स्वतंत्रता संघर्ष शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक जनांदोलनों की शक्ति का एक उत्कृष्ट उदाहरण रहा है।
  • दायित्ववान सदस्य: इतिहास संकलन समिति के सदस्य का उच्च चरित्र, त्याग, शील और निष्ठावान होना अनिवार्य है।

नई दिल्ली: नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के क्षेत्रीय कार्यालय (पारस विद्यापीठ करौंदी) में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना काशी प्रांत की ओर से एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का मुख्य प्रतिपाद्य विषय “इतिहास प्रयोजन : अध्ययन, अनुसंधान एवं लेखन” था, जिसमें देश भर के प्रतिष्ठित विद्वानों और विचारकों ने हिस्सा लिया।

इतिहास-लेखन और भारतीय चेतना का स्वरूप

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि डॉ. बालमुकुंद पांडे (राष्ट्रीय संगठन सचिव, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना झंडेवालन, नई दिल्ली) ने अपने मुख्य संबोधन में कहा कि वरिष्ठ विद्वान इतिहासकारों को समाज को एक सकारात्मक दिशा प्रदान करनी चाहिए। उन्होंने बल दिया कि आज की युवा पीढ़ी को शिक्षा में सुधार, रोजगार के अवसरों और लोकहित के अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर रचनात्मक, अहिंसक एवं सविनय विरोध करने के लिए प्रेरित किया जाना बेहद आवश्यक है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हमारा इतिहास-लेखन पूरी तरह से भारतीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों, जीवन दृष्टि और राष्ट्रीय आदर्शों के अनुरूप होना चाहिए।

स्वतंत्रता संघर्ष और लोकतांत्रिक परंपराएं

मुख्य अतिथि ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा स्वतंत्रता संघर्ष शांतिपूर्ण जनांदोलनों की शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण रहा है। उन्होंने आद्य सरसंघचालक पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय गुरुजी के विचारों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा लोकतांत्रिक संवाद और शांतिपूर्ण तरीकों के माध्यम से अपने विचारों और आदर्शों को कार्यकर्ताओं तक पहुंचाया। आपातकाल को भारतीय संसदीय इतिहास का “काला अध्याय” बताते हुए उन्होंने कहा कि उस दौर में भी तत्कालीन नेतृत्व ने लोकतांत्रिक एवं अहिंसक तरीकों से ही इसका विरोध किया था। यह साबित करता है कि भारत में शांतिपूर्ण विरोध केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है।

वक्ताओं के बहुमूल्य विचार और अध्यक्षता

संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि एवं पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) देवी प्रसाद सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि इतिहास संकलन समिति का दायित्ववान सदस्य वही व्यक्ति बन सकता है, जिसका व्यक्तित्व उच्च चरित्र, त्याग, शील और निष्ठा से परिपूर्ण हो।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए काशी प्रांत के प्रांत अध्यक्ष प्रोफेसर आनंद शंकर सिंह ने कहा कि इतिहास के अध्ययन का मूल उद्देश्य राष्ट्र-निर्माण की चेतना का उन्नयन करना है। वहीं, संगोष्ठी की संयोजिका एवं संचालिका प्रोफेसर अनुराधा सिंह ने इतिहास-लेखन पर अपनी दूर-दृष्टि और ऐतिहासिक उपागमों पर आधारित विद्वतापूर्ण मार्गदर्शन प्रदान किया, जिससे उपस्थित शोधार्थियों और विद्यार्थियों को काफी कुछ सीखने को मिला।

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