मक्का रक्षा समझौते का मसौदा तुर्किए की संसद में पेश

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुए 'मक्का डिफेंस पैक्ट' का ड्राफ्ट दुनिया के सामने आया, जानिए इसकी मुख्य शर्तें।

  • तुर्किए ने संसद में ‘मक्का रक्षा समझौते’ का मसौदा पेश किया।
  • समझौते के तहत संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा में होगी मदद।
  • PoK और गिलगिट-बाल्टistán अंतरराष्ट्रीय सीमा के दायरे से बाहर।

समग्र समाचार सेवा
अंकारा / नई दिल्ली, 23 अक्तूबर: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में पाकिस्तान, तुर्किए और सऊदी अरब के बीच पिछले दिनों हुए ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ (Mecca Joint Defence Agreement) का आधिकारिक मसौदा अब तुर्किए की संसद के पटल पर रख दिया गया है। तुर्किए सरकार द्वारा इस रक्षा समझौते के दस्तावेज को अपनी संसद में मंजूरी के लिए पेश किए जाने के बाद पहली बार इस त्रिपक्षीय सैन्य समझौते की विस्तृत शर्तें और प्रावधान दुनिया के सामने आए हैं। इस समझौते को लेकर वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों की निगाहें टिकी हुई हैं।

समझौते की धारा 1 और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का दायरा

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के बीच हस्ताक्षरित इस साझा रक्षा समझौते की धारा 1 के अनुसार, तीनों देश एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सीमाओं की रक्षा करने में परस्पर सहयोग करेंगे। यदि किसी एक देश की संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर कोई बाहरी खतरा उत्पन्न होता है, तो अन्य दोनों देश उसकी रक्षा के लिए अपने सभीसंभव संसाधनों का उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध होंगे।

हालांकि, इस समझौते में एक बेहद महत्वपूर्ण पेच भी सामने आया है। चूंकि समझौते में विशेष रूप से ‘अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सीमाओं’ का उल्लेख किया गया है, और पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) तथा गिलगिट-बाल्टिस्तान अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा विवादित क्षेत्र माने जाते हैं और इन्हें पाकिस्तान की आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं माना जाता है, इसलिए जानकारों का मानना है कि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच किसी सैन्य संघर्ष की स्थिति में यह मक्का रक्षा समझौता PoK के क्षेत्र पर लागू नहीं होगा।

सामरिक सहयोग, खुफिया जानकारी और हथियार साझा करने की शर्तें

इस त्रिपक्षीय समझौते के विभिन्न प्रावधानों में रक्षा और कूटनीति के कई अहम पहलुओं को शामिल किया गया है:

धारा 2 (सामूहिक प्रतिक्रिया): समझौते के प्रावधान के तहत यदि किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा और तीनों देश मिलकर यह तय करेंगे कि पीड़ित देश की सैन्य सहायता कैसे की जाए।

धारा 3 और 6 (रक्षा उत्पादन और युद्धाभ्यास): तीनों देश संयुक्त रक्षा उद्योग स्थापित करने, रक्षा उपकरणों का सह-उत्पादन (Joint Production) करने और संयुक्त सैन्य अभ्यास (Joint Exercises) आयोजित करने पर सहमत हुए हैं।

धारा 9 और 10 (खुफिया और लॉजिस्टिक सहायता): शांति काल हो या युद्ध की स्थिति, तीनों देश एक-दूसरे के साथ संवेदनशील खुफिया जानकारियां साझा करेंगे। इसके अलावा, युद्ध या आपातकाल के दौरान हथियार, गोला-बारूद, ईंधन और स्पेयर पार्ट्स जैसी लॉजिस्टिक सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

धारा 16 (समझौते से हटने का प्रावधान): इस रक्षा समझौते के नियमों के अनुसार, यदि कोई देश इस त्रिपक्षीय समझौते से बाहर निकलना चाहे, तो वह 10 वर्ष पूरे होने के बाद और अन्य दोनों देशों को 3 महीने पहले औपचारिक सूचना देकर खुद को अलग कर सकता है।

रणनीतिक और भू-राजनीतिक निहितार्थ

इस समझौते के सार्वजनिक होने के बाद दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के कूटनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि तुर्किए, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच यह रक्षा ढांचा क्षेत्रीय सुरक्षा को एक नया आयाम देने की कोशिश है। हालांकि, भारत के सामरिक हितों के लिहाज से इस बात पर विशेष नजर रखी जा रही है कि आपातकालीन लॉजिस्टिक सहायता और हथियार आपूर्ति के प्रावधानों का भविष्य में क्षेत्रीय संघर्षों पर क्या असर पड़ सकता है। तुर्किए की संसद में इस पर होने वाली बहस और इसे मिलने वाली औपचारिक मंजूरी के बाद इस समझौते का वास्तविक स्वरूप पूरी तरह से स्पष्ट हो जाएगा।

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