- संसद में लगातार गतिरोध और हंगामे पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सभी दलों से भावुक अपील की—“लोकतंत्र और जनता के लिए सदन चलने दें।”
- अध्यक्ष ने कहा—प्रश्नकाल, महत्वपूर्ण विधेयकों पर बहस और जनसमस्याओं पर सार्थक चर्चा जरूरी।
- संसद केवल राजनीतिक अखाड़ा नहीं, लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच—हर खोया घंटा जनता के कल्याण और जवाबदेही से दूर ले जाता है।
- सूत्रों के अनुसार, विपक्ष के कुछ सांसद भी मौजूदा कार्यशैली से असहज, लेकिन सार्वजनिक रूप से नहीं बोल पा रहे।
- विपक्ष की रणनीति से विकास और जनहित के मुद्दे हाशिए पर—सवाल, ऐसा करने से लोकतंत्र को क्या लाभ?
- चर्चा, असहमति और विपक्ष जरूरी, मगर बहस की जगह व्यवधान लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है।
- जनता ने सांसदों को सवाल-जवाब, नीति बहस और कानून बनाने के लिए चुना है, न कि संसद को अनिश्चितकाल तक ठप रखने के लिए।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 10 अगस्त :लगातार बाधित हो रही संसद कार्यवाही ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है—क्या लोकतंत्र जनता की सेवा कर सकता है, जब संसद चल ही नहीं रही? सूत्रों के मुताबिक, बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सभी दलों से अपील की कि प्रश्नकाल, विधेयक बहस और जनसमस्याओं पर संसद में गंभीर चर्चा होनी चाहिए, न कि केवल राजनीतिक टकराव। संसद के हर बाधित घंटे में जनता की आवाजें और जरूरी मुद्दे बाहर रह जाते हैं। विपक्ष के अंदर भी कुछ सांसद निजी तौर पर मौजूदा शैली से असहज हैं। लोकतंत्र बहस, जवाबदेही और भागीदारी से फलता-फूलता है—संसद का ठप रहना जनता के हित में नहीं है। सभी सांसदों की जिम्मेदारी बनती है कि वे राष्ट्रहित में मिलकर काम करें, केवल व्यवधान नहीं, बल्कि सार्थक संवाद और फैसले के लिए आगे बढ़ें।
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