- संसद समिति ने AI व उन्नत डिजिटलीकरण तकनीकों से भारत की सांस्कृतिक धरोहर-संरक्षण के लिए राष्ट्रीय मिशन की सिफारिश की।
- क्षतिग्रस्त पांडुलिपियों के लिए मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग, वैज्ञानिक डेटिंग, मेटाडेटा और रिसर्च प्रोग्राम का प्रस्ताव।
- ‘अक्षर मित्र’ प्लेटफॉर्म के ज़रिए नागरिक सहभागिता और विश्वविद्यालयों को ट्रांसक्रिप्शन में मान्यता मिले।
- अंतरराष्ट्रीय मानकों पर ओपन डिजिटल रिपॉजिटरी, विदेशों में रखी पांडुलिपियों की वैश्विक सूची व डिजिटल प्रतियां जुटाने की योजना।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 14 अगस्त :संसद की स्थायी समिति ने AI, आधुनिक डिजिटलीकरण तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए भारत की पांडुलिपि विरासत के संरक्षण और विस्तार के लिए महत्वाकांक्षी रोडमैप सुझाया है। ‘From Manuscript to Mission: Preserving, Mapping and Sustaining India’s Cultural Heritage in the Age of Artificial Intelligence’ शीर्षक वाली यह 393वीं रिपोर्ट संसद में समिति अध्यक्ष संजय कुमार झा ने पेश की।
समिति ने क्षतिग्रस्त पांडुलिपियों के लिए मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग, मटीरियल रिकॉर्ड, वैज्ञानिक डेटिंग, विस्तृत मेटाडेटा और रिसर्च प्रोग्राम की अनुशंसा की। अपठनीय पांडुलिपियों के डिकोडिंग के लिए वैज्ञानिक संस्थानों की मदद का सुझाव दिया।
जनभागीदारी बढ़ाने के लिए ‘अक्षर मित्र’ प्लेटफॉर्म पर नागरिक और विश्वविद्यालय मान्यता के साथ ट्रांसक्रिप्शन में योगदान कर सकेंगे। रिपोर्ट में सार्वजनिक फंडिंग से बनी पांडुलिपि छवियों और प्रमाणित ट्रांसक्रिप्शन की ओपन नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी बनाने की बात कही गई है।
पुरानी पांडुलिपियों में वर्णित खगोल व मौसम संबंधी सूचनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण कर ओपन डेटा सेट बनाने और विदेशों में रखी भारतीय पांडुलिपियों का डिजिटल संग्रह जुटाने की सिफारिश की गई है। मंत्रालयों व संस्थानों के सहयोग से राष्ट्रीय पंजी, इमेज इंटरऑपरेबिलिटी मानक, इमरजेंसी प्रिजर्वेशन के लिए ‘कल्चरल फर्स्ट-एड’ जैसे उपाय सुझाए गए।
समिति ने सुझाव दिया है कि भारत की पांडुलिपि धरोहर को पीएम गतिशक्ति मास्टर प्लान व ज्ञान पर्यटन से जोड़ा जाए, महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थलों के इर्द-गिर्द टूरिज्म सर्किट बने और कारीगरों को डिजिटल कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ने के लिए प्रमाणित सांस्कृतिक मैपिंग की जाए।
समिति का मानना है कि ये कदम भारत की अमूल्य पांडुलिपि धरोहर को न सिर्फ सुरक्षित रखेंगे, बल्कि नई पीढ़ी के लिए टेक्नोलॉजी-आधारित संरक्षण और शोध को भी संभव बनाएंगे।
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