पूनम शर्मा
भारत को स्टारलिंक की सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रस्ताव मिला था और दुर्भाग्य से कुछ शीर्ष राजनेता इसे लेकर आवश्यकता से अधिक उत्साहित दिखाई देने लगे थे। ऐसे समय में तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाले भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ (R&AW) के प्रमुख पराग जैन को हस्तक्षेप करना पड़ा। दावा किया जा रहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें स्टारलिंक से उत्पन्न होने वाले संभावित सुरक्षा खतरों, रणनीतिक निर्भरता और भारत की रक्षा क्षमताओं पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों को रेखांकित किया गया।
आधुनिक युद्ध में स्टारलिंक की भूमिका
रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि यूक्रेन द्वारा रूस के अंदरूनी क्षेत्रों में किए गए ड्रोन हमलों ने आधुनिक युद्ध की प्रकृति को किस प्रकार बदल दिया है।
स्टारलिंक से जुड़े अत्याधुनिक, कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन रडार की निगरानी से बचते हुए दुश्मन के क्षेत्र में काफी अंदर तक पहुंच सकते हैं और महत्त्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बना सकते हैं।
ये ड्रोन साधारण ग्लाइड तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करते हुए कम ऊंचाई पर उड़ान भर सकते हैं, अपनी गतिविधियों को छिपा सकते हैं तथा वास्तविक समय में प्राप्त सूचनाओं के आधार पर अंतिम क्षणों में अपने लक्ष्य की दिशा में सुधार कर सकते हैं।
पृथ्वी की निचली कक्षा में मौजूद हजारों उपग्रहों के माध्यम से स्टारलिंक तेज गति वाली और इलेक्ट्रॉनिक व्यवधानों के प्रति अपेक्षाकृत प्रतिरोधी संचार सुविधा प्रदान करता है। ऐसे नेटवर्क को बाधित करना उन्नत रूसी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों के लिए भी चुनौतीपूर्ण रहा है।
इसका परिणाम यह है कि ड्रोन निर्देशित मिसाइलों की तरह कार्य कर सकते हैं। वे अपेक्षाकृत शांत, सटीक और रोकने में कठिन हो सकते हैं।
विदेशी तकनीक पर निर्भरता का खतरा
लेकिन जिस तकनीक ने यूक्रेन को युद्ध के मैदान में बढ़त दिलाई है, उसी तकनीक का उपयोग विपरीत परिस्थितियों में उसके विरुद्ध भी किया जा सकता है।
रूस द्वारा अपने शाहेद (Shahed) ड्रोन में स्टारलिंक जैसी उपग्रह संचार प्रणालियों के प्रयोग की खबरें भी सामने आई हैं।
यह स्थिति एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। यदि किसी देश की रक्षा प्रणाली किसी विदेशी कंपनी के उपग्रह नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भर हो जाए, तो उस नेटवर्क के संचालन, सॉफ्टवेयर नियंत्रण अथवा नीतिगत निर्णयों में बदलाव उसकी सैन्य क्षमताओं को प्रभावित कर सकता है।
एक सॉफ्टवेयर प्रतिबंध या सेवा संबंधी नीतिगत परिवर्तन किसी देश के महत्त्वपूर्ण रक्षा अभियानों को अचानक बाधित करने की क्षमता रखता है।
भारत के लिए यह भय नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारी का प्रश्न है
भारत के संदर्भ में ऐसी आशंकाओं को केवल भय या अतिशयोक्ति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक तैयारियों से जुड़ा विषय है।
यदि स्टारलिंक भारत का प्रमुख उपग्रह इंटरनेट नेटवर्क बन जाता है, तो विदेशी नियंत्रण वाले संचार ढांचे पर अत्यधिक निर्भरता हाइब्रिड युद्ध के दौरान एक संभावित सुरक्षा कमजोरी बन सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में भारत के लिए अपनी स्वदेशी, सुरक्षित और विश्वसनीय उपग्रह इंटरनेट प्रणाली विकसित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जियो सहित भारतीय कंपनियों की अंतरिक्ष संचार परियोजनाएं इस दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं, हालांकि किसी परियोजना में वास्तविक स्वदेशी नियंत्रण और विदेशी तकनीकी निर्भरता का स्वतंत्र आकलन भी आवश्यक होगा।
डेटा, ड्रोन और डिजिटल आकाश का नया युद्धक्षेत्र
आज युद्ध केवल सीमाओं, सैनिकों और हथियारों तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक संघर्षों में डेटा, ड्रोन, उपग्रह संचार और डिजिटल नेटवर्क निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
ऐसे दौर में किसी भी विदेशी उपग्रह इंटरनेट सेवा को अनुमति देने से पहले उसके सुरक्षा प्रभावों, डेटा नियंत्रण, आपातकालीन संचालन और रणनीतिक निर्भरता की गंभीर समीक्षा आवश्यक है।
प्रस्तुत दावे के अनुसार, स्टारलिंक पर प्रतिबंध लगाने की पहल को भारत की सुरक्षा के प्रति दूरदर्शी कदम माना जा रहा है। इसका मूल संदेश स्पष्ट है कि आधुनिक युद्ध में संचार नेटवर्क पर नियंत्रण उतना ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है जितना युद्धक्षेत्र में हथियारों पर नियंत्रण।
क्योंकि भविष्य के युद्ध में जो संचार संकेतों और डेटा के प्रवाह को नियंत्रित करेगा, वह युद्धक्षेत्र की दिशा को भी प्रभावित करने की क्षमता रखेगा।
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