प्रदर्शन के नाम पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सर्वोच्च अदालत की दो टूक: विरोध प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक सड़कों या स्थानों पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा नहीं किया जा सकता, नागरिकों के अधिकारों में संतुलन जरूरी।

  • विरोध प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक जगहों पर स्थायी कब्जा अवैध।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आम नागरिकों के आने-जाने का अधिकार बाधित न हो।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनहित के बीच संतुलन होना आवश्यक।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 03 नवंबर: देश में विभिन्न मुद्दों पर होने वाले धरना-प्रदर्शनों और सार्वजनिक रास्तों व स्थानों को जाम करने की प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने एक बार फिर बेहद सख्त और स्पष्ट टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में दो टूक शब्दों में कहा है कि संविधान प्रदत्त ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ (Freedom of Speech and Expression) के अधिकार के तहत किसी भी समूह या संगठन को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वे विरोध प्रदर्शन के नाम पर सार्वजनिक सड़कों, पार्कों या सरकारी जमीनों पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा कर लें।

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार हर नागरिक को है, लेकिन इस प्रक्रिया से आम जनता, मरीजों, स्कूली बच्चों और दैनिक यात्रियों के मौलिक अधिकारों और आवागमन की स्वतंत्रता में बाधा नहीं आनी चाहिए।

सार्वजनिक संपत्तियों और रास्तों के अवरोध पर चिंता

हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में चाहे वह राजधानी दिल्ली की सीमाएं हों या अन्य महानगर, विभिन्न मांगों को लेकर सड़क और रेल मार्गों पर लंबे समय तक धरने-प्रदर्शन देने की संस्कृति तेजी से बढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सार्वजनिक स्थलों और मुख्य सड़कों पर लंबे समय तक कब्जा जमाए रहने से न केवल यातायात व्यवस्था पूरी तरह ठप होती है, बल्कि आपातकालीन सेवाओं (जैसे एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड) के आवागमन में भी गंभीर बाधा उत्पन्न होती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार अनियंत्रित नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों के कर्तव्यों और आम जनता की सहूलियत का ध्यान रखना भी उतना ही अनिवार्य है। विरोध प्रदर्शन के नाम पर पूरे शहर को बंधक बनाने या रोजमर्रा के जनजीवन को अस्त-व्यस्त करने की अनुमति कानूनन नहीं दी जा सकती।

प्रशासन और पुलिस के दायित्वों पर निर्देश

शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्थानीय प्रशासन, पुलिस और राज्य सरकारों को भी कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि वे सार्वजनिक स्थानों और सड़कों को अतिक्रमण मुक्त रखने के लिए अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का ईमानदारी से पालन करें। कोर्ट ने कहा कि प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने न पाए और आम नागरिकों के लिए मार्ग अवरुद्ध न हों।

यदि कोई संगठन या समूह बिना अनुमति के या तय नियमों का उल्लंघन करके सार्वजनिक रास्तों पर अनिश्चितकालीन कब्जा जमाने का प्रयास करता है, तो स्थानीय प्रशासन के पास यह कानूनी अधिकार और दायित्व है कि वह बिना किसी राजनीतिक दबाव के तुरंत उचित कार्रवाई करे।

व्यक्तिगत अधिकार बनाम सार्वजनिक हित का संतुलन

कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अत्यंत संतुलित और समयोचित है। एक तरफ जहां यह निर्णय नागरिकों को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाने के अधिकार का समर्थन करता है, वहीं दूसरी तरफ यह उन लाखों आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है जो इन प्रदर्शनों के कारण होने वाली असुविधा और आर्थिक नुकसान का सामना करते हैं। लोकतांत्रिक आंदोलनों और सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के बीच संतुलन बनाने की दिशा में यह फैसला एक मजबूत कानूनी मिसाल कायम करता है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इस बात की स्पष्ट याद दिलाता है कि लोकतंत्र में अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य भी जुड़े होते हैं। विरोध प्रदर्शन और आंदोलन समाज का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक संपत्तियों और रास्तों पर अनिश्चितकालीन कब्जा किसी भी स्थिति में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

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