पूनम शर्मा
वंदे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह गीत है, जिसने लाखों देशवासियों के दिलों में स्वतंत्रता की लौ जगाई। आज़ादी के बाद भी यह गीत भारत की एकता, अखंडता और देशभक्ति का प्रतीक बना रहा। लेकिन समय-समय पर इस गीत को लेकर भारतीय राजनीति, खासकर कांग्रेस पार्टी के रुख पर सवाल उठते रहे हैं।
कांग्रेस और वंदे मातरम: मुस्लिम तुष्टिकरण और कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी का वंदे मातरम के प्रति रुख हमेशा से विवादों में रहा है। 1937 में लखनऊ अधिवेशन के दौरान मुस्लिम लीग के विरोध के चलते कांग्रेस ने वंदे मातरम के सिर्फ दो पैराग्राफ गाने का फैसला किया। यह वही समय था, जब देश में हिंदू-मुस्लिम की राजनीति चरम पर थी और कांग्रेस अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए समझौतों पर उतारू थी।
कांग्रेस पार्टी के इतिहास में कई बार ऐसे मौके आए, जब उसने मुस्लिम वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए। शाहबानो केस से लेकर एंड्रॉयड बिल तक, कांग्रेस ने बार-बार मुस्लिम समुदाय को खुश करने के लिए नीतिगत बदलाव किए, भले ही उससे देश की मुख्यधारा भावनाओं को ठेस पहुंची हो। वंदे मातरम पर भी यही मानसिकता देखने को मिलती है।
क्षेत्रीय गीतों में देवी-देवताओं का उल्लेख, फिर वंदे मातरम पर दिक्कत क्यों?
हाल ही में हुई CWC (कांग्रेस वर्किंग कमेटी) की बैठक में कांग्रेस ने एक बार फिर दो पैराग्राफ गाने का प्रस्ताव पारित किया। यह न सिर्फ वंदे मातरम का अपमान है, बल्कि कांग्रेस का एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है—कांग्रेस मुस्लिम अपीजमेंट की नीति से पीछे नहीं हटेगी। राहुल गांधी की चर्चित टिप्पणी—”कोई हंकी टंकी मत करो, सीधे बोलो, मुसलमान के साथ खड़े हैं”—इसी नीति की पुष्टि करती है।
कांग्रेस की सरकारें कर्नाटक, तेलंगाना, केरल जैसे राज्यों में हैं, जहाँ राज्य गीतों में राम, कृष्ण, वेद, कपिल मुनि, पतंजलि जैसे हिंदू प्रतीकों का उल्लेख है। तमिलनाडु के राज्य गीत में भी डिवाइन मदर का जिक्र है। इन गीतों को कभी मुद्दा नहीं बनाया जाता, लेकिन वंदे मातरम पर विरोध क्यों? क्या यह दोहरे मापदंड नहीं?
कांग्रेस का वंदे मातरम पर रुख वही है, जिसने कभी मुस्लिम लीग को ताकत दी थी और आखिरकार देश का विभाजन हुआ। 1937 के बाद वंदे मातरम का केवल दो पद गाने का निर्णय, मुस्लिम लीग के दबाव में लिया गया था। आज भी कांग्रेस उसी मानसिकता के साथ राजनीति कर रही है—जहां वोटबैंक के लिए देश की एकता और सांस्कृतिक प्रतीकों को नजरअंदाज किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी और कानून आज का परिदृश्य: क्या कांग्रेस वाकई बदलना चाहती है?
आज कानून साफ है: वंदे मातरम का अपमान करना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद कांग्रेस पार्टी इस पर अपने “पर्सनल” रुख की बात करती है, जो न सिर्फ संवैधानिक भावनाओं का अपमान है, बल्कि आम जनता के विश्वास के साथ भी खिलवाड़ है।
2004 और 2006 में वंदे मातरम पर फतवे, बवाल और मुस्लिम अपीजमेंट की राजनीति, और अब 2026 में वही रुख—क्या कांग्रेस वाकई देश की मुख्यधारा की भावनाओं से जुड़ पा रही है? या फिर वह खुद को धीरे-धीरे “एंटी हिंदू” और “एंटी हिंदुस्तान” पार्टी के रूप में स्थापित कर रही है?
वंदे मातरम का अपमान—कांग्रेस की ऐतिहासिक भूल
वंदे मातरम का विरोध महज एक गीत तक सीमित नहीं हह देश की आत्मा, संस्कृति और एकता का अपमान है। कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि वह वोटबैंक की राजनीति छोड़कर देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि रखे। अन्यथा, इतिहास उन्हें एक ऐसी पार्टी के रूप में याद रखेगा, जिसने देश की अस्मिता से समझौता किया।
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