शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महान बांग्ला उपन्यासकार के योगदान को किया याद, कहा- उनके साहित्य ने भारतीय समाज और संस्कृति पर छोड़ी गहरी छाप।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महान बांग्ला लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जयंती पर उन्हें शत-शत नमन किया है।
- पीएम मोदी ने उनके उपन्यासों को 19वीं सदी के ग्रामीण भारतीय समाज और मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण बताया है।
- उनके साहित्य को सामाजिक सुधार, महिला अधिकारों और राष्ट्रीय चेतना का एक सशक्त माध्यम करार दिया गया है।
नई दिल्ली, 15 सितंबर: भारतीय साहित्य जगत के अमर हस्ताक्षर और प्रख्यात बांग्ला लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की 150वीं जन्म-जयंती के अवसर पर देश भर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। इस विशेष अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया और आधिकारिक संदेश के जरिए महान साहित्यकार को नमन करते हुए उनके कृतित्व और व्यक्तित्व को याद किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की रचनाएं पाठकों के दिलों पर सदियों से राज करती आ रही हैं और उनकी लोकप्रियता सीमाओं से परे है। उनके द्वारा रचित उपन्यास आज भी 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत के ग्रामीण बंगाल व भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं।
विभिन्न भाषाओं में अनूदित अमर कृतियां
शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यासों और कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि वे हर वर्ग के पाठक के दिल को छू जाती हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में इस बात का विशेष उल्लेख किया कि उनकी कृतियों का लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कई विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद किया गया है। ‘देवदास’, ‘परिणीता’, ‘बिक्री’ और ‘श्रीकांत’ जैसे उनके प्रसिद्ध उपन्यासों ने न केवल साहित्य प्रेमियों को प्रभावित किया, बल्कि भारतीय फिल्म जगत को भी अनगिनत बार प्रेरित किया है। उनके पात्र समाज के साधारण लोगों के संघर्ष, प्रेम, पीड़ा और मानवीय संवेदनाओं का सटीक प्रतिनिधित्व करते हैं।
सामाजिक सुधार और राष्ट्रीयता की प्रेरणा
साहित्यिक सृजन के साथ-साथ शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का जीवन समाज सुधार और राष्ट्रप्रेम की भावनाओं से ओत-प्रोत था। उनकी रचनाओं में महिलाओं के अधिकारों, रूढ़िवादी परंपराओं के खिलाफ मुखर विरोध और सामाजिक न्याय की गूंज स्पष्ट रूप से सुनाई देती है। प्रधानमंत्री ने देश के युवाओं से आह्वान किया कि वे आने वाले समय में शरतचंद्र के साहित्यों को अवश्य पढ़ें ताकि वे अपने अतीत, संस्कृति और समाज की मूल जड़ों को गहराई से समझ सकें। उनकी 150वीं जयंती का यह अवसर देश की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत (‘विरासत’) को संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक बेहतरीन माध्यम बन गया है।
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