सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: इंटरनेट मौलिक अधिकार

शीर्ष अदालत ने बच्चों समेत सभी के लिए इंटरनेट तक पहुंच को मौलिक अधिकार बताया, बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) रोकने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश।

  • इंटरनेट तक पहुंच और इस्तेमाल हर नागरिक का मौलिक अधिकार।
  • CSAM हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश।
  • सोशल मीडिया खातों के लिए ‘चाइल्ड मोड’ शुरू करने का सुझाव।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 27 अक्तूबर: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले के तहत, उच्चतम न्यायालय ने बच्चों सहित देश के हर नागरिक के लिए इंटरनेट तक पहुंच और उसके उपयोग को एक स्पष्ट ‘मौलिक अधिकार’ (Fundamental Right) घोषित किया है। अदालत ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (CSAM) की पहचान करने और उसे तुरंत हटाने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का कड़ा निर्देश केंद्र सरकार को दिया है। न्यायालय की इस व्यवस्था से डिजिटल अधिकारों और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित हुआ है।

अनुच्छेद 21 और 19(1)(ए) के तहत मिला अधिकार

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि उन्हें यह बात दोहराने में कोई संकोच नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(ए) के अंतर्गत इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। पीठ ने स्पष्ट किया कि देश के बच्चों को भी, उनकी उम्र चाहे जो भी हो, संविधान द्वारा प्रदत्त यही अधिकार प्राप्त हैं।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्चों को इस अधिकार से पूरी तरह वंचित करना उतना ही अतार्किक और अनुचित होगा जितना यह तर्क देना कि एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों की अंतरात्मा ऐसी नहीं है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए, या उनके पास अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता नहीं है जिसे व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। न्यायालय के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि दोनों का सह-अस्तित्व संभव और आवश्यक है।

इंटरनेट बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं, पर सजा के तौर पर पहुंच न छीनी जाए

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान इस बात को स्वीकार किया कि वर्तमान समय में इंटरनेट बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित जगह नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी पूरी दृढ़ता के साथ स्पष्ट किया कि यदि डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली कंपनियां हानिकारक और आपत्तिजनक सामग्री की पहचान कर उसे हटाने में विफल रहती हैं, तो इसकी सजा बच्चों को इंटरनेट से वंचित करके नहीं दी जा सकती। बच्चों को डिजिटल दुनिया से दूर करना पीड़ित को ही समस्या मान लेने जैसा अनुचित कदम होगा।

यह कानूनी लड़ाई ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस’ (JRCA) एवं अन्य बनाम एस. हरीश एवं अन्य मामले के तहत लड़ी गई। ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन’ बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए कार्य करने वाला भारत का सबसे बड़ा नागरिक समाज नेटवर्क है, जो 300 से अधिक संगठनों के साथ मिलकर बाल यौन शोषण, चाइल्ड ट्रैफिकिंग और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ सक्रिय रूप से आवाज उठाता है।

राष्ट्रीय हैश एवं यूआरएल सूची डेटाबेस की स्थापना का निर्देश

बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) से सख्ती से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक राष्ट्रीय हैश एवं यूआरएल सूची डेटाबेस स्थापित करने का व्यापक निर्देश जारी किया है। अदालत ने कहा कि इस डेटाबेस में किसी भी आपत्तिजनक सामग्री को शामिल करने से पहले कई कड़े स्तरों पर उसकी पुष्टि की जानी चाहिए। सामग्री की अंतिम जांच कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए, जो स्वतंत्र रूप से यह सुनिश्चित करें कि संबंधित सामग्री वास्तव में CSAM की श्रेणी में आती है या नहीं।

डेटाबेस में दर्ज प्रत्येक प्रविष्टि का उपयोग देश में कार्यरत सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियां अपनी वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद सामग्री का मिलान करने तथा उससे मेल खाने वाली अवैध सामग्री को तत्काल हटाने के लिए करेंगी। कानून प्रवर्तन एजेंसियां भी इसी तंत्र का उपयोग कर संदिग्ध सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने की कार्रवाई करेंगी। यदि किसी प्लेटफॉर्म को इस डेटाबेस से मेल खाने वाली कोई सामग्री मिलती है, तो उसे बिना किसी अतिरिक्त पुष्टि की प्रतीक्षा किए तुरंत निष्क्रिय कर हटाना होगा। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को इन दिशा-निर्देशों में समय-समय पर संशोधन करने के निर्देश दिए गए हैं।

सोशल मीडिया पर ‘चाइल्ड मोड’ और माता-पिता की निगरानी

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया खातों के लिए ‘चाइल्ड मोड’ (Child Mode) शुरू करने का अनूठा सुझाव दिया है। इसके तहत बच्चों के अकाउंट डिफ़ॉल्ट रूप से निजी (Private) रखे जा सकते हैं, अनजान वयस्कों द्वारा संपर्क करने या संदेश भेजने पर कड़े प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, तथा बच्चों को दिखाई जाने वाली विज्ञापनों व अन्य सामग्री पर भी प्रभावी नियंत्रण रखा जा सकता है। इसके लिए माता-पिता की सहमति की पुष्टि के सुरक्षित और पारदर्शी तरीके अपनाने पर जोर दिया गया है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला डिजिटल युग में बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के बीच बेहतरीन संतुलन स्थापित करता है। यह आदेश स्पष्ट करता है कि तकनीक की इस दुनिया में बच्चों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें सुरक्षित डिजिटल परिवेश प्रदान करना सरकार, न्यायपालिका और टेक कंपनियों की संयुक्त जिम्मेदारी है।

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