संजय राउत ने CJI से मांगी माफी, 17 नवंबर को पेशी
शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने न्यायपालिका पर की गई टिप्पणियों के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया बिना शर्त माफीनामा, व्यक्तिगत पेशी का आदेश बरकरार।
- संजय राउत ने सुप्रीम कोर्ट में बिना शर्त मांगी माफी।
- CJI और न्यायपालिका पर टिप्पणी से जुड़ा है अवमानना मामला।
- सुप्रीम कोर्ट ने 17 नवंबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से किया तलब।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 29 अक्तूबर: भारतीय राजनीतिक गलियारों और न्यायपालिका से जुड़े मामलों में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और देश की न्यायपालिका के खिलाफ कथित तौर पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कानूनी शिकंजे में फंसे शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद संजय राउत ने उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष अपना बिना शर्त माफीनामा (Unconditional Apology) दाखिल कर दिया है। हालांकि, कोर्ट द्वारा उनके माफीनामे और मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्हें अभी राहत नहीं मिली है, और अदालत ने उन्हें आगामी 17 नवंबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का कड़ा निर्देश दिया है।
इस पूरे प्रकरण ने देश की राजनीति और कानूनी जगत में खासी हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि अवमानना मामले में संस्थागत गरिमा सर्वोपरि है।
‘न्यायपालिका का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था’—संजय राउत का हलफनामा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सांसद संजय राउत की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक औपचारिक हलफनामा दाखिल किया गया है। इस हलफनामे में उन्होंने अदालत के समक्ष बिना शर्त, पूर्ण और स्वैच्छिक रूप से माफी मांगते हुए कहा है कि उनका कभी भी देश की न्यायपालिका की गरिमा, स्वतंत्रता या उसके अधिकारों को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था।
राउत ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि वे भारतीय संविधान, कानून के शासन और सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा का पूरी तरह से सम्मान करते हैं। उन्होंने अपने बयानों या सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट को लेकर खेद प्रकट किया है और कहा है कि उनका उद्देश्य किसी भी प्रकार से अदालत के अधिकार क्षेत्र या साख को कम आंकना नहीं था। इसके बावजूद, कानूनी जानकारों का मानना है कि केवल माफीनामा दाखिल कर देने से आपराधिक अवमानना की कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं हो जाती, बल्कि अदालत इस पर विचार करने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लेती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट की सख्ती और व्यक्तिगत पेशी का आदेश
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ के समक्ष जब यह मामला आया, तो कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि सुनवाई के शुरुआती दौर में राउत की ओर से कोई अधिकृत वरिष्ठ वकील समय पर प्रतिनिधित्व करने के लिए उपस्थित नहीं हो सका। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि हालांकि हलफनामा दाखिल किए जाने की बात कही गई है, लेकिन यह प्रक्रियात्मक रूप से रिकॉर्ड पर देखे जाने योग्य है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मामला किसी एक व्यक्तिगत न्यायाधीश या अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था और उसकी संस्थागत पवित्रता से जुड़ा हुआ है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि संजय राउत आगामी 17 नवंबर को दोपहर 2 बजे व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहें।
सह-आरोपी पत्रकार निखिल वागले को मिली वर्चुअल पेशी की छूट
इस आपराधिक अवमानना मामले में सांसद संजय राउत के साथ-साथ पत्रकार निखिल वागले को भी पक्षकार बनाया गया था। मामले में निखिल वागले की ओर से भी अपना लिखित माफीनामा और खेद प्रकट करने से जुड़ा हलफनामा कोर्ट में प्रस्तुत किया गया।
अदालत ने राहत देते हुए पत्रकार निखिल वागले को आगामी 17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (Virtual Mode) के माध्यम से कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दे दी है। हालांकि, सांसद संजय राउत को लेकर अदालत ने अपने रुख में नरमी नहीं बरती है और उन्हें व्यक्तिगत रूप से शारीरिक तौर पर अदालत में हाजिर होने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा अवमानना प्रकरण?
यह पूरा कानूनी विवाद तब तूल पकड़ा था जब देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और न्यायपालिका के कामकाज को लेकर सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ तीखी टिप्पणियां की गई थीं। इसके बाद ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ (SCBA) और अन्य पक्षों द्वारा इन बयानों को न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ मानते हुए आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की याचिका दायर की गई थी। महान्यायवादी (Attorney General) द्वारा सहमति दिए जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए नोटिस जारी किया था।
निष्कर्ष
संजय राउत द्वारा बिना शर्त माफी मांगे जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें व्यक्तिगत रूप से तलब किए जाने से यह साफ हो गया है कि शीर्ष अदालत न्यायपालिका की गरिमा के मामलों में बेहद सख्त और सतर्क रुख अपनाए हुए है। अब 17 नवंबर को होने वाली आगामी सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी, जहां अदालत यह तय करेगी कि माफीनामे को स्वीकार किया जाए या अवमानना की कार्रवाई को आगे बढ़ाया जाए।
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