इजरायल में आम चुनाव, नेतन्याहू के भविष्य की बड़ी परीक्षा

पश्चिम एशिया के भारी तनाव के बीच इजरायल में मतदान जारी, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी ईसेनकोट के बीच कड़ा मुकाबला।

  • इजरायल में 2019 के बाद से हो रहा है छठा आम चुनाव।
  • पीएम नेतन्याहू को गादी ईसेनकोट की पार्टी से कड़ी टक्कर।
  • नेतन्याहू की हार के बावजूद ईरान युद्ध नीति पर असर पर संशय।

समग्र समाचार सेवा
येरुशलम, 27 अक्तूबर: पश्चिम एशिया में जारी भारी भू-राजनीतिक तनाव, संघर्षों और युद्ध के साये के बीच इजरायल में मंगलवार को आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। वर्ष 2019 के बाद से यह देश का छठा चुनाव है, जो इजरायल की गहरी राजनीतिक अस्थिरता और बंटी हुई संसद का स्पष्ट प्रमाण है। अक्टूबर 2023 के हमलों और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा ईरान के मोर्चे पर बदले सुरक्षा हालातों के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक करियर की यह अब तक की सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा मानी जा रही है।

इजरायल की 120 सीटों वाली संसद (नेसेट) के लिए हो रहे इस चुनाव में 70 लाख से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। सरकार गठन के लिए बहुमत का जादुई आंकड़ा 61 सीटों का है। ओपिनियन पोल के अनुसार, प्रधानमंत्री नेतन्याहू की पुरानी दक्षिणपंथी पार्टी ‘लिकुड’ (Likud) को पूर्व इजरायली सैन्य प्रमुख गादी ईसेनकोट (Gadi Eisenkot) के नेतृत्व वाली नई केंद्रवादी ‘यशार’ पार्टी से बेहद कड़ी टक्कर मिल रही है।

नेतन्याहू का प्रचार और ईरान युद्ध को लेकर बड़े दावे

चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने देश की जनता से अपील करते हुए दावा किया कि यदि उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी सत्ता में आते हैं, तो इजरायल को ईरान के हाथों भारी नुकसान और अस्तित्व के संकट का सामना करना पड़ सकता है। नेतन्याहू ने मतदाताओं के सामने खुद को देश की राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे मजबूत पहरेदार के रूप में पेश किया है। उनका तर्क है कि हमास और हिजबुल्लाह के खिलाफ शुरू किए गए अभियानों को तार्किक अंजाम तक पहुंचाने के लिए उनकी सरकार का बने रहना अनिवार्य है।

दूसरी ओर, उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सेना प्रमुख गादी ईसेनकोट ने नेतन्याहू की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मौजूदा सरकार ने देश को अनिश्चितकालीन युद्ध में झोंक दिया है और जनता के आर्थिक मुद्दों की लगातार अनदेखी की जा रही है। ईसेनकोट के समर्थकों का आरोप है कि नेतन्याहू अपने राजनीतिक फायदों के लिए क्षेत्रीय तनाव को लंबा खींच रहे हैं।

यदि नेतन्याहू चुनाव हार गए, तो क्या रुक जाएगा ईरान युद्ध?

अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि यदि चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की हार होती है, तो क्या इजरायल की युद्ध नीतियों या ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में कोई बड़ा बदलाव आएगा? जानकारों का मानना है कि सत्ता परिवर्तन होने के बावजूद इजरायल की मूल राष्ट्रीय सुरक्षा नीति और ईरान के प्रति उसका कड़ा रुख रातों-रात बदलने वाला नहीं है।

भले ही नए प्रधानमंत्री या गठबंधन सरकार युद्ध संचालन को लेकर अधिक सावधानी बरतें और अपने समय के अनुसार फैसले लें, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा के बुनियादी मुद्दों पर इजरायल के तमाम राजनीतिक दलों की सोच लगभग एक जैसी ही है। इसके अलावा, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन की रणनीतिक भूमिका भी इस पूरे समीकरण में निर्णायक साबित होगी। ईरान के परमाणु कार्यक्रमों पर लगाम कसने के मामले में वाशिंगटन का रुख इजरायल की हर सरकार के लिए सर्वोपरि रहेगा।

देश के सामने आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां

सुरक्षा और सैन्य संघर्षों के अलावा इस चुनाव में घरेलू मुद्दे भी मतदाताओं के लिए बेहद अहम हैं। देश में बढ़ती महंगाई, कम वेतन, भारी-भरकम रक्षा बजट के कारण आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा वित्तीय दबाव, तथा यहूदियों की अनिवार्य सैन्य भर्ती जैसे मुद्दों ने समाज और राजनीतिक दलों के बीच गहरी दरारें पैदा कर दी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव के नतीजे चाहे जो भी हों, नई सरकार के सामने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और आंतरिक सामाजिक सौहार्द को बहाल करने की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

निष्कर्ष

इजरायल के आम चुनाव के परिणाम न केवल बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य का निर्धारण करेंगे, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के भविष्य की दिशा भी तय करेंगे। मतदान संपन्न होने के बाद आने वाले परिणाम यह स्पष्ट कर देंगे कि इजरायल की जनता ने सुरक्षा के नाम पर नेतन्याहू के नेतृत्व पर एक बार फिर भरोसा जताया है या किसी नए राजनीतिक विकल्प को चुना है।

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